1977 में इजरायली विदेश मंत्री मोशे दयान की भारत की सीक्रेट यात्रा, वाजपेयी और मोरारजी देसाई से मुलाकात, और इंदिरा गांधी का सियासी हमला — जानिए भारत-इजरायल संबंधों की 50 साल पुरानी कहानी।
PM Modi Israel Visit: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया इजरायल दौरे ने एक बार फिर भारत-इजरायल संबंधों को सुर्खियों में ला दिया है। 2017 में उनकी ऐतिहासिक यात्रा किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली आधिकारिक इजरायल यात्रा थी। हालांकि भारत ने 1992 में इजरायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए, लेकिन इसके कई साल पहले दोनों देशों के बीच परदे के पीछे कूटनीतिक संपर्क जारी थे।
इसी कड़ी में 1977 की एक बेहद गोपनीय यात्रा का जिक्र आता है, जब इजरायल के तत्कालीन विदेश मंत्री मोशे दयान ने भारत का सीक्रेट दौरा किया था। यह घटना भारत-इजरायल संबंधों के इतिहास का अहम लेकिन कम चर्चित अध्याय है।
1977: भारत और इजरायल में राजनीतिक बदलाव का साल
1977 का वर्ष दोनों देशों के लिए ऐतिहासिक था।
भारत में आपातकाल के बाद पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी अटल बिहारी वाजपेयी के पास थी।
वहीं इजरायल में मेनकेम बेगिन के नेतृत्व में लिकुड पार्टी सत्ता में आई और उन्होंने मोशे दयान को विदेश मंत्री बनाया।
14 अगस्त 1977: गुप्त रूप से भारत पहुंचे मोशे दयान
मोशे दयान ने अपनी आत्मकथा Breakthrough: A Personal Account of Egypt-Israel Peace Negotiations में इस यात्रा का उल्लेख किया है।
14 अगस्त 1977 को वह तेल अवीव से अल-इटालिया की फ्लाइट से मुंबई पहुंचे। बताया जाता है कि वह अलग भेष में थे। वहां से उन्हें विशेष विमान से दिल्ली लाया गया। दिल्ली में उनकी मुलाकात प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से हुई।
मुलाकात एक सरकारी गेस्ट हाउस में हुई और इसे लंबे समय तक गोपनीय रखा गया।
दयान भारत क्यों आए थे?
मोशे दयान के भारत आने के दो मुख्य उद्देश्य थे:
- अक्टूबर 1977 के जेनेवा शांति सम्मेलन को लेकर इजरायल का पक्ष समझाना।
- भारत-इजरायल के बीच राजनयिक संबंधों को बेहतर बनाने की संभावनाएं तलाशना।
लेकिन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने स्पष्ट संकेत दिया कि भारत पश्चिम एशिया में शांति चाहता है और फिलिस्तीनी मुद्दे पर अपनी स्थापित नीति से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया, हालांकि इजरायल के अस्तित्व को नकारने की बात से भी असहमति जताई।
देसाई ने घरेलू राजनीतिक परिस्थितियों और भारत की मुस्लिम आबादी का हवाला देते हुए कहा कि उस समय पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित करना संभव नहीं है।
बैठक का नतीजा: मौका हाथ से निकला?
मुलाकात सौहार्दपूर्ण रही, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। दयान को भविष्य में अमेरिका या यूरोप में वाजपेयी से मिलने की अनुमति मिली, लेकिन इजरायल आमंत्रण नहीं दिया गया।
यह प्रयास भारत-इजरायल संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में शुरुआती कोशिश था, जो तत्काल सफल नहीं हो सका।
इंदिरा गांधी का राजनीतिक हमला
जनता सरकार गिरने के बाद 1979-80 में इस गुप्त यात्रा की जानकारी सार्वजनिक हुई। तत्कालीन विपक्ष की नेता इंदिरा गांधी ने 1980 के आम चुनाव से पहले इसे बड़ा मुद्दा बनाया।
राज्यसभा में 13 जून 1980 को इस पर सवाल उठे और मीडिया में भी व्यापक चर्चा हुई। इसे जनता सरकार की “गुप्त कूटनीति” के रूप में पेश किया गया।
1992 में बने पूर्ण राजनयिक संबंध
हालांकि 1977 की यह कोशिश तत्काल परिणाम नहीं दे सकी, लेकिन करीब 15 साल बाद 1992 में भारत और इजरायल के बीच पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित हुए।
इसके बाद संबंध लगातार मजबूत होते गए। 2003 में इजरायल के प्रधानमंत्री रहे एरियल शैरोन ने भारत का दौरा किया और 2018 में बेंजामिन नेतन्याहू भारत आए।
आज दोनों देशों के बीच रक्षा, कृषि, तकनीक और रणनीतिक सहयोग के मजबूत संबंध हैं।
1977 में मोशे दयान की गुप्त भारत यात्रा भारत-इजरायल संबंधों के इतिहास का एक अहम लेकिन असफल कूटनीतिक प्रयास थी। उस समय की घरेलू राजनीति और पश्चिम एशिया नीति के कारण संबंधों को औपचारिक रूप नहीं मिल सका।
हालांकि, यह घटना इस बात का संकेत थी कि दोनों देशों के बीच संवाद की इच्छा पहले से मौजूद थी — जो अंततः 1992 में औपचारिक रिश्तों में बदल गई।

