वीरांगना ऊदा देवी पासी, झलकारी बाई कोरी और अवंती बाई लोधी—1857 के स्वतंत्रता संग्राम की तीन महान नायिकाएँ। सीएम योगी और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लखनऊ में ऊदा देवी की प्रतिमा का अनावरण किया। जानिए इन तीन वीरांगनाओं की प्रेरक गाथा।
1857 के महान स्वतंत्रता संग्राम की अदम्य वीरांगना ऊदा देवी पासी के बलिदान दिवस पर लखनऊ में उनकी शानदार प्रतिमा का अनावरण किया गया। इस मौके पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मौजूद रहे।
सीएम योगी ने कहा कि यह पल हर भारतीय के लिए गर्व का है। उन्होंने याद दिलाया कि पीएसी की महिला बटालियन का नाम तीन महान वीरांगनाओं—ऊदा देवी पासी, झलकारी बाई कोरी और अवंती बाई लोधी—के नाम पर रखा गया है।
सीएम योगी के अनुसार,
“ये तीनों महिलाएं उस दौर में अंग्रेजों से लड़ीं, जब महिलाओं का नाम भी घर से बाहर नहीं लिया जाता था। इन वीरांगनाओं ने तलवार उठाई और ब्रिटिश हुकूमत को घुटनों पर ला दिया।”
कौन थीं वीरांगना ऊदा देवी पासी?
दलित समाज से आने वाली ऊदा देवी लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल की सुरक्षा टुकड़ी में थीं। पहले वे सेविका थीं, लेकिन साहस और बुद्धिमत्ता को देखते हुए उन्हें सैनिक प्रशिक्षण दिया गया।
चिनहट के युद्ध में दिखाया शौर्य
1857 में अंग्रेजों और नवाबी सेना के बीच चिनहट में भीषण युद्ध हुआ, जिसमें ऊदा देवी के पति मक्का पासी शहीद हो गए।
पति की शहादत ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि और मजबूत बनाया।
कहा जाता है—
- एक लड़ाई के दौरान ऊदा देवी एक पेड़ पर चढ़ गईं
- वहां से उन्होंने सटीक निशाना लगाते हुए करीब 30 अंग्रेज सैनिक मार गिराए
- अंग्रेज यह देखकर दंग रह गए कि इतनी अद्भुत गोलीबारी करने वाली एक महिला थी
अंत में वे शहीद हुईं, लेकिन अंग्रेजों के दिलों में ऐसा डर बैठा गईं कि आज भी पासी समाज उन्हें अपने गौरव की पहचान मानता है।
झलकारी बाई कोरी: रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल और रणनीतिक योद्धा
दलित कोरी समाज की जन्मी झलकारी बाई बचपन से ही युद्धकला में निपुण थीं। जब वे झांसी पहुँचीं, तो रानी लक्ष्मीबाई ने उनके साहस को पहचानकर उन्हें अपने विशेष महिला दल में शामिल किया।
समान चेहरे का लाभ लेकर रानी को बचाया
इतिहास में दर्ज है कि झलकारी बाई, रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल थीं।
झांसी घिरने पर—
- झलकारी ने रानी का रूप धारण किया
- अंग्रेजों को छल में उलझाए रखा
- रानी को सुरक्षित बाहर निकलने का समय मिला
अंततः उन्होंने देश के लिए प्राणों का बलिदान दिया।
आज वे सिर्फ योद्धा नहीं, बल्कि रणनीति और नेतृत्व की मिसाल मानी जाती हैं।
अवंती बाई लोधी: वो रानी जिसने अंग्रेजों को चुनौती देने की हिम्मत दिखाई
1831 में जन्मी अवंती बाई लोधी, रामगढ़ रियासत की रानी थीं।
पति की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने राज्य हड़पने की कोशिश की, लेकिन अवंती बाई ने झुकने से इनकार किया।
खुद संभाली सेना की कमान
- आसपास के छोटे राज्यों और गांवों को संगठित किया
- अंग्रेजों के खिलाफ कठोर युद्ध छेड़ा
- मंडला और दमोह तक अंग्रेजी सेना को चुनौती दी
जब अंग्रेजी सेना ने उन्हें चारों ओर से घेरा, तब भी उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया।
अंतिम सांस तक लड़ते हुए वे शहीद हुईं।
इन तीन वीरांगनाओं को याद करना क्यों है खास?
सीएम योगी की यह पहल सिर्फ सम्मान नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक संदेश है:
महिलाओं को सुरक्षा बलों में बड़ी भूमिका देने का संकेत
यूपी पुलिस और पीएसी में इन वीरांगनाओं के नाम पर महिला बटालियन—
→ इतिहास और आधुनिकता का संगम।
दलित और पिछड़े वर्ग की नायिकाओं का पुनर्सम्मान
ये वे नाम हैं जिन्हें इतिहास में उतना स्थान नहीं मिला, जितना मिलना चाहिए था।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा
ट्रेनिंग में शामिल युवतियाँ जब इन नामों को सुनेंगी, तो उनमें साहस और नेतृत्व की भावना और मजबूत होगी।
ऊदा देवी पासी, झलकारी बाई कोरी और अवंती बाई लोधी — ये सिर्फ नाम नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की वे लौह-नारी हैं जिन्होंने साबित किया कि साहस, नेतृत्व और बलिदान लिंग या जाति पर निर्भर नहीं होता।
सीएम योगी का यह कदम उन अनसुनी नायिकाओं को उचित पहचान दिलाने का प्रयास है, जिन्होंने अपने समय में इतिहास लिखा था।

