अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान वैश्विक व्यापार नीतियों में बड़ा बदलाव करते हुए भारत, चीन और कई अन्य देशों पर भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगा दिया था। ट्रंप का यह कदम उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा में रहा, क्योंकि इससे न केवल वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ, बल्कि अमेरिका और कई देशों के बीच ट्रेड वॉर (व्यापार युद्ध) भी छिड़ गई।
भारत पर 50% टैरिफ – रूस से तेल खरीदने का कारण
ट्रंप प्रशासन ने भारत पर रूस से तेल खरीदने के कारण 50 प्रतिशत का टैरिफ लगाया था। अमेरिका का आरोप था कि भारत रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदकर डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं में भुगतान कर रहा है, जिससे अमेरिकी प्रतिबंधों की अवहेलना हो रही थी।
अमेरिकी सरकार ने कहा था कि रूस से तेल खरीदना “अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा स्थिरता” के लिए खतरा है और इससे अमेरिका के आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचता है। ट्रंप ने यह कदम अमेरिकी ऊर्जा क्षेत्र को मजबूत करने और घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया था।
अमेरिका-चीन टैरिफ वॉर का लंबा दौर
ट्रंप प्रशासन का सबसे बड़ा टकराव चीन के साथ हुआ। 2018 से शुरू हुई यह टैरिफ वॉर कई वर्षों तक चली। अमेरिका ने चीन के अरबों डॉलर के सामान पर 25 से 50 प्रतिशत तक का शुल्क लगाया। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाया, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ गया।
इस व्यापार युद्ध का असर पूरे विश्व पर पड़ा — वैश्विक बाजारों में अस्थिरता आई, विनिर्माण और आयात-निर्यात प्रभावित हुए, और कई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव देखा गया।
ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल में ‘America First’ नीति को प्राथमिकता दी। इस नीति के तहत उन्होंने अमेरिकी उद्योगों और श्रमिकों की सुरक्षा के लिए विदेशी उत्पादों पर ऊंचे टैरिफ लगाए।
ट्रंप का कहना था कि कई देश अमेरिका के व्यापारिक हितों का दुरुपयोग कर रहे हैं। उनका मानना था कि इन टैरिफों से अमेरिकी उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी निर्भरता कम होगी।
भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर असर
भारत पर लगाए गए 50% टैरिफ ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों में तनाव पैदा किया। भारत ने इस कदम को “अनुचित” बताया और अमेरिका के फैसले पर आपत्ति जताई।
विशेष रूप से, स्टील, एल्यूमीनियम और ऊर्जा उत्पादों पर बढ़े टैरिफ के कारण भारतीय निर्यातकों को नुकसान हुआ। हालांकि बाद में दोनों देशों ने बातचीत के जरिए इस तनाव को कम करने की कोशिश की।
विशेषज्ञों की राय
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की नीतियों ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था में “प्रोटेक्शनिज्म” यानी संरक्षणवाद को बढ़ावा दिया। इससे कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं को झटका लगा, खासकर उन देशों को जो अमेरिका के बड़े व्यापारिक साझेदार थे।
हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इन नीतियों से अमेरिका में स्थानीय उद्योगों को अस्थायी राहत जरूर मिली, लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यापार की स्थिरता पर इसका दीर्घकालिक नकारात्मक असर हुआ।
ट्रंप के कार्यकाल के दौरान लगाया गया यह टैरिफ नीति परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भूराजनीतिक (Geopolitical) कदम भी था। भारत पर रूस से तेल खरीदने के लिए 50% टैरिफ और चीन के साथ चले व्यापार युद्ध ने वैश्विक राजनीति को नया मोड़ दिया।
आज भी विशेषज्ञ इस बात पर चर्चा करते हैं कि ट्रंप की “टैरिफ वॉर” ने दुनिया के आर्थिक समीकरणों को गहराई से बदल दिया और आने वाले वर्षों तक इसकी गूंज अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महसूस की जाएगी।

