फ्रीबी कल्चर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: “मुफ्त बांटने से विकास रुकता है”, CJI सूर्यकांत की तमिलनाडु को नसीहत

Supreme Court ने फ्रीबी कल्चर पर सख्त टिप्पणी की। CJI सूर्यकांत ने तमिलनाडु की मुफ्त बिजली योजना पर सवाल उठाए और कहा कि इससे आर्थिक विकास प्रभावित होता है। जानें पूरी खबर।

नई दिल्ली: Supreme Court of India ने चुनावी ‘फ्रीबी कल्चर’ पर कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्यों को सख्त संदेश दिया है। इलेक्ट्रिसिटी अमेंडमेंट रूल्स 2024 के रूल 23 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने मुफ्त योजनाओं पर सवाल उठाए और कहा कि ऐसी नीतियों पर अब पुनर्विचार का समय आ गया है, क्योंकि इससे देश का आर्थिक विकास प्रभावित होता है।

यह टिप्पणी Tamil Nadu Power Distribution Corporation Limited की उस याचिका पर आई, जिसमें उपभोक्ताओं की आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना सभी को मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव रखा गया था।

“किस तरह की संस्कृति विकसित कर रहे हैं?”

CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा:

“हम भारत में किस तरह की संस्कृति विकसित कर रहे हैं? यह समझ में आता है कि जो लोग बिल चुकाने में असमर्थ हैं, उन्हें राहत दी जाए। लेकिन बिना अंतर किए सबको मुफ्त देना क्या तुष्टिकरण नीति नहीं है?”

पीठ ने कहा कि देश के अधिकांश राज्य पहले से ही राजस्व की कमी से जूझ रहे हैं, इसके बावजूद विकास परियोजनाओं के बजाय मुफ्त योजनाओं पर जोर दिया जा रहा है।

रोजगार बनाम फ्रीबी: कोर्ट की स्पष्ट राय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यों को मुफ्त भोजन, साइकिल या बिजली बांटने के बजाय रोजगार के अवसर सृजित करने पर ध्यान देना चाहिए।

CJI ने टिप्पणी की:

“अगर आप सुबह से शाम तक मुफ्त भोजन, फिर मुफ्त साइकिल और मुफ्त बिजली देंगे, तो कौन काम करेगा? काम करने की संस्कृति का क्या होगा?”

पीठ ने यह भी कहा कि कई राज्य विकास कार्यों पर खर्च करने के बजाय दो काम कर रहे हैं—वेतन देना और मुफ्त योजनाएं बांटना।

बिजली दर घोषित होने के बाद क्यों बदला फैसला?

अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि जब बिजली दरें पहले ही घोषित हो चुकी थीं, तो उसके बाद तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ने अचानक मुफ्त बिजली देने का फैसला क्यों किया?

हालांकि, कोर्ट ने याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

चुनावी फ्रीबी पर बढ़ती न्यायिक सख्ती

पिछले कुछ वर्षों में चुनावों से पहले मुफ्त योजनाओं की घोषणा पर बहस तेज हुई है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी संकेत देती है कि न्यायपालिका इस मुद्दे को गंभीरता से देख रही है और आर्थिक संतुलन बनाम कल्याणकारी योजनाओं के बीच स्पष्ट रेखा खींचने की जरूरत महसूस कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने चुनावी फ्रीबी संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि सार्वभौमिक मुफ्त योजनाएं आर्थिक अनुशासन और विकास की गति को प्रभावित कर सकती हैं। अब नजर इस बात पर है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस पर क्या रुख अपनाती हैं।