‘एक देश, एक चुनाव’ पर फिर गरमाई सियासत: क्या भारत में संभव है संयुक्त चुनाव?

नई दिल्ली: भारत की राजनीति में ‘एक देश, एक चुनाव’ यानी One Nation, One Election का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में केंद्र सरकार की ओर से इस पर एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा रिपोर्ट पेश की गई है, जिसने संयुक्त चुनावों की दिशा में गंभीर सिफारिशें की हैं। इसके बाद देश की सियासत में गर्माहट आ गई है — कुछ दल इस कदम को लोकतंत्र को मजबूत करने वाला बता रहे हैं, तो कुछ इसे तानाशाही की ओर एक और कदम मान रहे हैं।

आख़िर क्या है यह ‘एक देश, एक चुनाव’? इससे जनता को क्या लाभ होगा? विपक्ष को इसमें क्या आपत्ति है? क्या यह भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में व्यावहारिक हो सकता है? इन सभी सवालों पर आइए विस्तार से नजर डालते हैं।

‘एक देश, एक चुनाव’ की अवधारणा क्या है?
‘एक देश, एक चुनाव’ का मतलब है कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाएं। आज की स्थिति में देश में हर साल कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं — कभी किसी राज्य में विधानसभा, तो कभी उपचुनाव या निकाय चुनाव। इससे न केवल सरकारी खर्च बढ़ता है, बल्कि विकास कार्यों पर भी असर पड़ता है।

इस प्रणाली में सभी विधानसभाएं और संसद का कार्यकाल एकसाथ शुरू और एकसाथ समाप्त होगा। इसके लिए चुनाव आयोग और संविधान में कुछ संशोधनों की आवश्यकता होगी।

ताज़ा घटनाक्रम
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में बनी समिति ने हाल ही में अपनी रिपोर्ट केंद्र को सौंपी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि एक साथ चुनाव 2029 तक लागू किए जा सकते हैं।

इसके लिए संवैधानिक संशोधन, राज्यों की सहमति और चुनाव आयोग की तैयारियों की जरूरत होगी।

सरकार का कहना है कि इससे करोड़ों रुपये की बचत होगी और प्रशासनिक तंत्र पर दबाव कम होगा।

केंद्र सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार, विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लंबे समय से इस विचार का समर्थन करते रहे हैं। उनका तर्क है:

लागत में भारी कमी: हर चुनाव में अरबों रुपये खर्च होते हैं। एक साथ चुनाव होने से यह खर्च कम होगा।

सरकारी कामकाज में रुकावट नहीं: आचार संहिता बार-बार लागू होने से विकास योजनाएं ठप हो जाती हैं।

राजनीतिक स्थिरता: एक साथ चुनाव से जनता को एक स्पष्ट जनादेश मिलेगा, जिससे सरकारें स्थिर होंगी।

विपक्ष की आपत्तियां
वहीं दूसरी ओर, विपक्ष के कई नेता इस प्रस्ताव का तीखा विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है:

संविधान की आत्मा के खिलाफ: भारत संघीय ढांचा है, जहां राज्यों को स्वतंत्र शासन का अधिकार है।

एक पार्टी को फायदा: चूंकि केंद्र में सत्तारूढ़ दल के पास अधिक संसाधन हैं, ऐसे में यह एकतरफा चुनाव हो सकते हैं।

लोकतांत्रिक बहस पर खतरा: अगर पांच साल तक कोई चुनाव न हो, तो सरकार की जवाबदेही कम हो जाएगी।

कांग्रेस, डीएमके, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जैसे दलों ने इस रिपोर्ट को ‘जनता की आवाज़ को दबाने का प्रयास’ बताया है।

क्या कहती है रिपोर्ट?
रामनाथ कोविंद समिति की रिपोर्ट में कहा गया है:

चरणबद्ध तरीके से संयुक्त चुनावों की शुरुआत की जा सकती है।

पहले लोकसभा और चार–पांच राज्यों के चुनाव एक साथ कराए जाएं, फिर शेष को मिलाया जाए।

संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174, 356 में संशोधन की जरूरत होगी।

इसके लिए सभी राजनीतिक दलों से संवाद आवश्यक है।

जनता की राय
‘आज की आवाज़’ द्वारा करवाए गए एक ऑनलाइन सर्वे में 62% लोगों ने ‘एक देश, एक चुनाव’ के पक्ष में अपनी राय दी। उनका कहना है:

बार-बार चुनाव से टीवी पर सिर्फ राजनीति छाई रहती है।

स्कूल, कॉलेज और सरकारी दफ्तर महीनों तक चुनावी ड्यूटी में लगे रहते हैं।

विकास कार्यों में देरी होती है।

हालांकि कुछ लोगों ने यह भी कहा कि इससे स्थानीय मुद्दों पर ध्यान नहीं जाएगा और राष्ट्रीय स्तर की राजनीति हावी हो जाएगी।

चुनाव आयोग की तैयारी
भारत निर्वाचन आयोग ने भी कई बार इस प्रस्ताव को सैद्धांतिक रूप से सही बताया है, लेकिन उसके अनुसार:

एक साथ चुनाव कराने के लिए 30 लाख EVM और VVPAT मशीनों की जरूरत होगी।

पूरे देश में जिला और राज्य स्तर पर एक साथ लॉजिस्टिक प्लानिंग करनी होगी।

सुरक्षा बलों की भारी तैनाती आवश्यक होगी।

व्यावहारिक चुनौतियाँ
राज्यों के कार्यकाल अलग-अलग हैं, किसी का कार्यकाल 2025 में खत्म हो रहा है तो किसी का 2027 में।

अगर बीच में किसी सरकार का पतन हो गया, तो उस राज्य में क्या दोबारा चुनाव होगा?

यह भी तय करना होगा कि किसी राज्य की विधानसभा या लोकसभा का कार्यकाल छोटा कर दिया जाए या बढ़ाया जाए, जो संवैधानिक चुनौती बन सकती है।

सभी राज्यों की सहमति लेना भी आसान नहीं होगा, खासकर जब कई पर विपक्षी दल शासन कर रहे हों।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
भारत के अलावा दुनिया के 9 से अधिक देशों में एक साथ चुनाव की प्रणाली अपनाई जाती है। इनमें स्वीडन, बेल्जियम, दक्षिण अफ्रीका आदि शामिल हैं। लेकिन भारत का लोकतांत्रिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक स्वरूप इनसे भिन्न है, इसलिए उनकी तुलना पूरी तरह उचित नहीं मानी जा सकती।

निष्कर्ष
‘एक देश, एक चुनाव’ एक महत्वपूर्ण और दूरगामी सोच है, जिसका उद्देश्य लोकतंत्र को अधिक कुशल और किफायती बनाना है। लेकिन इसे लागू करने से पहले सभी पक्षों का सहमति बनाना, संविधानिक सुधार लाना और जनता को भरोसे में लेना बेहद आवश्यक है। किसी भी बड़े सुधार को थोपना नहीं चाहिए, बल्कि लोकतांत्रिक संवाद के माध्यम से अपनाना चाहिए।

सही योजना, पारदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में भी यह प्रयोग सफल हो सकता है। लेकिन यह तभी मुमकिन है जब इसकी आड़ में सत्ता को केंद्रीकृत करने का प्रयास न हो, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने का इरादा हो।

लोकतंत्र बहस और सहमति से चलता है, बलपूर्वक नहीं।”
— आज की आवाज़ न्यूज़ एक्सपर्ट टीम