Nepal PM Balen Shah Controversy: भारत-नेपाल सीमा विवाद पर बयान देने के बाद नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह राजनीतिक विवादों में घिर गए हैं। संसद में अनुपस्थिति और कूटनीतिक टिप्पणियों पर विपक्ष ने उठाए सवाल।
सीमा विवाद पर ब्रिटेन और चीन की भूमिका की बात के बाद विपक्ष और सहयोगी दलों ने साधा निशाना
काठमांडू: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह इन दिनों अपने बयानों और संसद में लगातार अनुपस्थिति को लेकर राजनीतिक विवादों के केंद्र में हैं। भारत-नेपाल सीमा विवाद के समाधान में ब्रिटेन और चीन की संभावित भूमिका का जिक्र करने के बाद उन्हें विपक्षी दलों, राजनीतिक सहयोगियों और विदेश नीति विशेषज्ञों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।
नेपाल की राजनीति में बदलाव और नए प्रयोगों के प्रतीक माने जाने वाले बालेन शाह अब अपने ही देश में बढ़ते राजनीतिक दबाव का सामना कर रहे हैं। संसद में उनकी अनुपस्थिति और हालिया बयान को लेकर सवाल लगातार तेज हो रहे हैं।
संसद में अनुपस्थिति पर उठे सवाल
नेपाल की संसद के नए भवन में स्थानांतरण के बाद उम्मीद थी कि सरकार और संसद के बीच समन्वय बेहतर होगा। हालांकि विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रधानमंत्री बालेन शाह संसद सत्रों में पर्याप्त उपस्थिति नहीं दे रहे हैं, जिससे कई महत्वपूर्ण विधायी और प्रशासनिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री की जवाबदेही संसद के प्रति होती है और उनकी अनुपस्थिति से नीतिगत चर्चाओं तथा विकास परियोजनाओं की गति प्रभावित हो सकती है।
भारत-नेपाल सीमा विवाद पर बयान बना चर्चा का विषय
हाल ही में संसद में दिए गए एक बयान में प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भारत-नेपाल सीमा विवाद और ऐतिहासिक समझौतों का उल्लेख किया। उन्होंने 1816 की सुगौली संधि का जिक्र करते हुए सीमा से जुड़े मुद्दों पर व्यापक ऐतिहासिक समीक्षा की आवश्यकता बताई।
इसके साथ ही उन्होंने सीमा विवाद के समाधान में ब्रिटेन की ऐतिहासिक भूमिका का संदर्भ दिया और चीन का नाम भी चर्चा में आने से राजनीतिक बहस तेज हो गई। भारत लंबे समय से सीमा संबंधी मुद्दों को द्विपक्षीय वार्ता के माध्यम से सुलझाने की नीति पर कायम रहा है।
विपक्ष और सहयोगियों की प्रतिक्रिया
प्रधानमंत्री के बयान के बाद नेपाल के कई विपक्षी दलों ने उनकी आलोचना की है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रकार के बयान संवेदनशील कूटनीतिक मुद्दों को और जटिल बना सकते हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ नेताओं ने भी प्रधानमंत्री की टिप्पणी से दूरी बनाई है। वहीं नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर से स्पष्ट किया गया कि देश की आधिकारिक नीति द्विपक्षीय संवाद और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर विवादों के समाधान की है।
विशेषज्ञों ने जताई चिंता
नेपाल के कई विदेश नीति विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों का मानना है कि प्रधानमंत्री के सार्वजनिक बयानों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। उनका कहना है कि सीमा और विदेश नीति जैसे संवेदनशील विषयों पर दिए गए वक्तव्यों में सावधानी बरतना आवश्यक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक संबंध बेहद गहरे हैं, इसलिए दोनों देशों के बीच किसी भी मुद्दे का समाधान संवाद और कूटनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से ही बेहतर तरीके से संभव है।
राजनीतिक भविष्य पर नजर
बालेन शाह के हालिया बयानों और संसद में उनकी सक्रियता को लेकर नेपाल की राजनीति में चर्चा तेज है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन विवादों का किस प्रकार समाधान करती है और संसद में अपनी भूमिका को किस तरह मजबूत बनाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री के लिए यह समय अपनी नीतियों, संवाद शैली और राजनीतिक रणनीति को लेकर महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकता है।

