FSSAI CEO राजित पुन्हानी के दो वक्त भोजन वाले बयान से बहस छिड़ गई है। जानें प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भोजन के नियम, इंटरमिटेंट फास्टिंग और दिन में तीन बार खाने का सच।
नई दिल्ली: क्या स्वस्थ रहने के लिए दिन में तीन बार खाना जरूरी है? आमतौर पर नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा माना जाता है। लेकिन हाल ही में FSSAI के CEO राजित पुन्हानी के एक बयान के बाद इस सवाल पर नई बहस शुरू हो गई है कि क्या भारतीय परंपरा में तीन के बजाय दो बार भोजन करने की व्यवस्था थी।
2 सितंबर 2026 को दिए एक मीडिया इंटरव्यू में राजित पुन्हानी ने कहा कि भारतीय परंपरा में तीन निश्चित भोजन—ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर—का मौजूदा स्वरूप पारंपरिक नहीं था और दिन में दो बार भोजन करना ज्यादा पारंपरिक पैटर्न रहा है।
हालांकि, इस बयान को आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान की सार्वभौमिक सलाह मानना सही नहीं होगा। अलग-अलग लोगों की उम्र, स्वास्थ्य, शारीरिक गतिविधि, काम की प्रकृति और चिकित्सकीय जरूरतों के आधार पर भोजन की जरूरत अलग हो सकती है।
FSSAI CEO ने क्या कहा?
FSSAI CEO राजित पुन्हानी ने कहा कि पारंपरिक भारतीय भोजन व्यवस्था में तीन निश्चित भोजन का वर्तमान मॉडल नहीं था। उन्होंने आधुनिक खान-पान में बढ़ते पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई।
FSSAI की ‘ईट राइट थाली’ पहल में भी स्थानीय, पारंपरिक और घर में तैयार भोजन को प्राथमिकता देने पर जोर दिया जाता है।
FSSAI की ओर से 2025 में प्रकाशित एक पुस्तक में देश के 29 राज्यों की पारंपरिक थालियों को शामिल किया गया था। इसमें भारतीय भोजन परंपरा में अनाज, दाल, मसाले, मौसमी सब्जियां, फल और दूध से बने उत्पादों सहित विभिन्न खाद्य पदार्थों की भूमिका को दर्शाया गया है।
क्या वेदों और प्राचीन ग्रंथों में दो बार भोजन का उल्लेख है?
दिन में दो बार भोजन करने को लेकर कई प्राचीन भारतीय ग्रंथों और आयुर्वेदिक साहित्य के संदर्भ दिए जाते हैं। हालांकि, इन ग्रंथों की व्याख्या और उनके ऐतिहासिक संदर्भ को लेकर विद्वानों के बीच अलग-अलग मत हो सकते हैं।
आपके दिए गए संदर्भों के अनुसार, तैत्तिरीय ब्राह्मण, विभिन्न धर्मसूत्रों, स्मृतियों और महाभारत के शांति पर्व में भोजन के समय और भोजन के बीच अंतराल से संबंधित नियमों का उल्लेख मिलता है।
इन संदर्भों में गृहस्थों के लिए दिन में दो बार भोजन करने और भोजन के बीच अनावश्यक खाने से बचने जैसी बातों का उल्लेख होने का दावा किया जाता है।
1. तैत्तिरीय ब्राह्मण का संदर्भ
तैत्तिरीय ब्राह्मण के एक संदर्भ को दिन में दो बार भोजन की व्यवस्था से जोड़ा जाता है। इसी आधार पर यह तर्क दिया जाता है कि प्राचीन भारतीय भोजन व्यवस्था में सीमित और निर्धारित समय पर भोजन करने की परंपरा थी।
2. धर्मसूत्र और स्मृति साहित्य
गौतम धर्मसूत्र, बौधायन धर्मसूत्र, मनुस्मृति और संवर्त स्मृति सहित कुछ ग्रंथों में भोजन के नियमों और भोजन के बीच अंतराल का उल्लेख मिलता है।
इन संदर्भों में गृहस्थ के लिए निर्धारित समय पर भोजन करने और बीच-बीच में खाने से बचने की बात कही गई है।
3. महाभारत में भोजन का समय
महाभारत के शांति पर्व से भी सुबह और शाम भोजन करने तथा इनके बीच कुछ न खाने से जुड़ा संदर्भ दिया जाता है।
हालांकि, ऐसे प्राचीन ग्रंथों के संदर्भों को आज की पूरी आबादी के लिए अनिवार्य डाइट प्लान मानना उचित नहीं होगा।
4. सुश्रुत संहिता और भोजन का समय
आयुर्वेदिक साहित्य में भी भोजन के समय, मात्रा और पाचन को महत्वपूर्ण माना गया है। सुश्रुत संहिता से जुड़े संदर्भों में दिन के अलग-अलग समय पर भोजन करने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
लेकिन आयुर्वेदिक ग्रंथों में भोजन संबंधी नियम व्यक्ति की प्रकृति, दिनचर्या और परिस्थितियों से भी जुड़े हुए हैं। इसलिए इन्हें आधुनिक समय में बिना विशेषज्ञ सलाह के एक समान नियम के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।
क्या दो बार खाना वैज्ञानिक रूप से ज्यादा बेहतर है?
यहां सबसे जरूरी बात यह है कि दिन में दो बार खाना हर व्यक्ति के लिए वैज्ञानिक रूप से बेहतर साबित नहीं हुआ है।
इंटरमिटेंट फास्टिंग और टाइम-रिस्ट्रिक्टेड ईटिंग पर आधुनिक शोध जरूर हो रहे हैं। कुछ अध्ययनों में सीमित समय के भीतर भोजन करने से वजन, मेटाबॉलिक स्वास्थ्य या कुछ अन्य स्वास्थ्य संकेतकों में संभावित फायदे देखे गए हैं। लेकिन इसके परिणाम व्यक्ति और अपनाए गए तरीके के अनुसार अलग हो सकते हैं।
इसलिए यह कहना कि तीन बार खाना गलत है या दो बार खाना हर किसी के लिए ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक है, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों से सीधे साबित नहीं होता।
तीन वक्त के भोजन का चलन कैसे बढ़ा?
आज तीन वक्त का भोजन—नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना—दुनिया के कई हिस्सों में सामान्य दिनचर्या बन चुका है। भारत में भी शहरीकरण, औद्योगीकरण, स्कूल-कॉलेज और 9 से 5 की नौकरी वाली जीवनशैली ने भोजन के समय को काफी प्रभावित किया।
काम के निश्चित समय और लंच ब्रेक जैसी व्यवस्थाओं ने भी भोजन को तय समय में बांटने में भूमिका निभाई।
इसके अलावा आधुनिक खाद्य उद्योग और पैकेज्ड फूड की उपलब्धता ने नाश्ते और बीच-बीच में स्नैकिंग की आदत को भी बढ़ावा दिया है।
हालांकि, तीन वक्त के भोजन की पूरी लोकप्रियता को केवल ब्रिटिश प्रभाव या खाद्य कंपनियों की मार्केटिंग से जोड़ना भी इतिहास को जरूरत से ज्यादा सरल बनाना होगा। अलग-अलग समाजों और परिवारों में भोजन की परंपराएं हमेशा एक जैसी नहीं रही हैं।
इंटरमिटेंट फास्टिंग और प्राचीन भारतीय परंपरा में क्या समानता है?
इंटरमिटेंट फास्टिंग में भोजन करने और न करने के निश्चित समय का पालन किया जाता है। इसी वजह से कुछ लोग इसे प्राचीन भारतीय भोजन और उपवास की परंपराओं से जोड़ते हैं।
लेकिन दोनों को पूरी तरह समान मानना सही नहीं होगा। इंटरमिटेंट फास्टिंग एक आधुनिक पोषण संबंधी अवधारणा है, जबकि प्राचीन भारतीय ग्रंथों में भोजन के नियम धार्मिक, सामाजिक, आध्यात्मिक और आयुर्वेदिक संदर्भों से जुड़े हुए थे।
तो क्या तीन बार खाना गलत है?
नहीं। सिर्फ दिन में तीन बार भोजन करने को अपने आप में गलत नहीं कहा जा सकता।
किसी व्यक्ति के लिए कितनी बार और कितना भोजन उचित है, यह उसकी उम्र, स्वास्थ्य, शारीरिक गतिविधि, दिनचर्या और व्यक्तिगत जरूरतों पर निर्भर करता है। बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों, एथलीट्स और कुछ स्वास्थ्य स्थितियों वाले लोगों की पोषण संबंधी जरूरतें अलग हो सकती हैं।
इसलिए FSSAI CEO के बयान को भारतीय भोजन परंपरा पर चर्चा शुरू करने वाला विचार माना जा सकता है, लेकिन इसे हर व्यक्ति के लिए दिन में केवल दो बार भोजन करने की चिकित्सकीय सलाह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारतीय परंपरा में भोजन को केवल पेट भरने की प्रक्रिया नहीं बल्कि अनुशासन, समय, मात्रा और जीवनशैली से जोड़कर देखा गया है। प्राचीन साहित्य में दो बार भोजन और भोजन के बीच अंतराल से जुड़े कई संदर्भ बताए जाते हैं।
वहीं आधुनिक विज्ञान भोजन की संख्या से ज्यादा कुल पोषण, भोजन की गुणवत्ता, कैलोरी संतुलन, नियमितता और व्यक्ति की स्वास्थ्य जरूरतों पर जोर देता है।
इसलिए असली सवाल शायद यह नहीं है कि “दिन में दो बार खाएं या तीन बार?”, बल्कि यह है कि हम क्या खा रहे हैं, कितनी मात्रा में खा रहे हैं और हमारी भोजन की आदतें हमारी जीवनशैली के लिए कितनी उपयुक्त हैं।

