बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में रिकॉर्ड तोड़ मतदान हुआ है। गुरुवार (6 नवंबर) को 18 जिलों की 121 सीटों पर पड़े वोटों में 64.66% लोगों ने अपने मताधिकार का उपयोग किया। यह वोटिंग प्रतिशत पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में करीब 8.5 प्रतिशत अधिक है। यही आंकड़ा राजनीतिक विश्लेषकों और सत्ता पक्ष के लिए चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि बिहार के चुनावी इतिहास में जब भी मतदान प्रतिशत में 5% से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, सत्ता परिवर्तन की संभावना अधिक रही है।
इतिहास कहता है—जब वोट बढ़े, सरकार बदली
बिहार में कई बार ऐसा हुआ है कि मतदान प्रतिशत में भारी बढ़ोतरी ने सत्ता की तस्वीर बदल दी।
| चुनाव वर्ष | मतदान प्रतिशत | बढ़ोतरी | सत्ता पर असर |
|---|---|---|---|
| 1962 | 44.5% | — | — |
| 1967 | 51.5% | +7% | कांग्रेस की हार, पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार |
| 1977 | 50.5% | — | — |
| 1980 | 57.3% | +6.8% | जनता पार्टी की हार, कांग्रेस की वापसी |
यानी जब भी 5% से अधिक वोटिंग बढ़ी, जनता ने बदलाव का मन बनाया।
2020 के मुकाबले इस बार मतदान अधिक
2020 के विधानसभा चुनाव में पहले चरण में 71 सीटों पर 56.1% मतदान हुआ था।
जबकि 2025 में पहले चरण में 121 सीटों पर 64.66% वोट पड़े, जो कि ऐतिहासिक है।
इससे स्पष्ट है कि मतदाता इस बार अधिक संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचे हैं, चाहे वह बदलाव की चाह हो या किसी नेतृत्व के प्रति समर्थन।
बिहार में वोटिंग प्रतिशत का अब तक का सफर
| वर्ष | मतदान प्रतिशत |
|---|---|
| 1951-52 | 42.6% |
| 1957 | 43.24% |
| 1962 | 44.47% |
| 1967 | 51.51% |
| 1969 | 52.79% |
| 1972 | 52.79% |
| 2010 | 52.73% |
| 2015 | 56.91% |
| 2020 | 57.29% |
| 2025 (पहला चरण) | 64.66% |
इतिहास बताता है कि जितना अधिक वोट, उतना बड़ा राजनीतिक संदेश।
नीतीश कुमार की बढ़ी चिंता
पहले चरण के मतदान ने एनडीए के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही नीतीश सरकार के लिए चुनौती खड़ी कर दी है।
अगर ऐतिहासिक पैटर्न दोहराया गया, तो भारी मतदान सत्ता परिवर्तन की ओर इशारा कर सकता है।
हालांकि, यह भी सच है कि उच्च मतदान अक्सर युवाओं और पहली बार वोट करने वालों की सक्रियता को भी दर्शाता है, जो राजनीतिक समीकरण को कहीं भी मोड़ सकता है।
आगे के चरण पर नज़र
पहले चरण ने चुनावी माहौल में उत्साह और प्रतिस्पर्धा दोनों को तेज कर दिया है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि:
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आगे के चरणों में क्या वोटिंग प्रतिशत इसी तरह ऊंचा रहता है?
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और क्या इतिहास खुद को दोहराता है?
पहले चरण के मतदान ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि इस बार जनता चुप नहीं है, उसने खुले तौर पर अपना फैसला दर्ज किया है।
लेकिन यह फैसला बदलाव का होगा या विश्वास की पुनरावृत्ति, इसका पता 3 चरणों के मतदान के बाद आने वाले नतीजों से ही चलेगा।

