ब्रिक्स विस्तार से बदलती वैश्विक राजनीति: भारत के लिए नए अवसर और चुनौतियाँ”

2025 का वैश्विक परिदृश्य तीव्र गति से बदल रहा है। दुनिया की पारंपरिक महाशक्तियाँ जैसे अमेरिका और यूरोपीय संघ अब एक बहुध्रुवीय विश्व में अपने प्रभुत्व को बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर चीन, रूस, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश ब्रिक्स के माध्यम से वैश्विक संतुलन को पुनर्परिभाषित कर रहे हैं।

ब्रिक्स का विस्तार, जो अब BRICS+ के रूप में जाना जा रहा है, ने वैश्विक कूटनीति, व्यापार और भू-राजनीति में नई हलचल मचा दी है।

BRICS+ में नए देशों की एंट्री
2024 के अंत में जोहान्सबर्ग में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में ईरान, सऊदी अरब, मिस्र, इथियोपिया और अर्जेंटीना को समूह में शामिल किया गया। इसके साथ ही ब्रिक्स अब दुनिया की 40% आबादी और GDP के 36% हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ डॉ. विक्रम सेन कहते हैं:
“ब्रिक्स का विस्तार सिर्फ एक गठबंधन नहीं, बल्कि पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती देने की रणनीति है। भारत के लिए यह अवसर भी है और रणनीतिक संतुलन की परीक्षा भी।”

भारत की रणनीतिक स्थिति
अवसर:
ऊर्जा साझेदारी: भारत सऊदी अरब और ईरान के साथ ऊर्जा समझौतों को और मज़बूत कर सकता है।

व्यापार बहुपक्षीयता: पश्चिम के दवाब से मुक्त व्यापार की संभावनाएं बढ़ीं।

वैश्विक नेतृत्व: संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर भारत की भूमिका अब और निर्णायक हो सकती है।

चुनौतियाँ:
चीन की बढ़ती पकड़: BRICS में चीन का वर्चस्व भारत के लिए एक रणनीतिक जोखिम बन सकता है।

रूस-चीन गठजोड़: यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को चुनौती दे सकता है।

ईरान-सऊदी अरब समीकरण: दो परस्पर विरोधी गुटों को एक ही मंच पर बनाए रखना एक कूटनीतिक संतुलन की मांग करता है।

पूर्व राजदूत तृप्ति शाह का कहना है:
“भारत को अब गैर-पक्षपाती नीति से एक सक्रिय वैश्विक नीति की ओर बढ़ना होगा, जहाँ वह न सिर्फ साझेदार बने, बल्कि दिशा-निर्धारक भी हो।”

भारतीय संसद की प्रतिक्रिया
हाल ही में लोकसभा में इस मुद्दे पर चर्चा हुई जहाँ विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा:

“भारत BRICS+ में एक मजबूत, स्वतंत्र और संतुलित आवाज़ के रूप में कार्य करेगा। हमारा उद्देश्य वैश्विक दक्षिण (Global South) की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करना है।”

विपक्ष ने सरकार से पारदर्शिता और संसद में विस्तृत चर्चा की माँग की ताकि भारत की दीर्घकालिक विदेश नीति का स्पष्ट खाका जनता के सामने रखा जा सके।

आर्थिक मोर्चे पर असर
1. नई करेंसी पहल:
BRICS ने डॉलर-आधारित व्यापार पर निर्भरता कम करने के लिए एक ब्रिक्स मुद्रा (BRICS Currency) शुरू करने का प्रस्ताव रखा है। यदि यह लागू होता है, तो भारत के लिए यह अवसर और चिंता दोनों बन सकता है।

अर्थशास्त्री प्रो. राघव भाटिया कहते हैं:
“भारत को वित्तीय स्वतंत्रता की दिशा में यह अवसर मिल सकता है, लेकिन अपनी मुद्रा और विदेशी निवेश पर इसका असर गंभीरता से सोचना होगा।”

2. नए व्यापार गलियारे:
भारत-मध्य एशिया-अफ्रीका कनेक्टिविटी की संभावनाएँ बढ़ी हैं।

ईरान का चाबहार पोर्ट और INSTC (International North-South Transport Corridor) भारत के लिए गेमचेंजर बन सकता है।

वैश्विक प्रतिक्रिया
अमेरिका ने BRICS+ विस्तार पर सतर्क प्रतिक्रिया दी है और इसे “गैर-लोकतांत्रिक देशों का गठजोड़” कहा है।

यूरोपीय संघ ने ऊर्जा और पर्यावरणीय मानकों को लेकर चिंता जताई है।

अफ्रीकी देश इसे “नई विश्व व्यवस्था में अपनी आवाज़” मान रहे हैं।

नीतिशास्त्री डॉ. सविता अरोड़ा के अनुसार:
“यह सिर्फ संगठन नहीं, बल्कि वैश्विक सत्ता संरचना का पुनर्निर्माण है, जिसमें भारत को सजग रहना होगा।”

निष्कर्ष: आगे की राह
भारत के सामने BRICS+ के साथ जुड़कर एक नई आर्थिक-सामरिक धुरी बनाने का स्वर्णिम अवसर है, लेकिन इसके लिए उसे अपनी अंतरराष्ट्रीय रणनीति, निजी हितों की रक्षा, और चीन जैसे विरोधियों के वर्चस्व से सावधान रहकर कदम बढ़ाने होंगे।

इस बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को एक ऐसी भूमिका निभानी है जहाँ वह विकासशील देशों की आवाज़ बन सके, ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो और एक निर्णायक वैश्विक शक्ति के रूप में उभरे।