UGC Rules 2026: CJI सूर्यकांत की टिप्पणी, केंद्र सरकार कर रही नए नियमों की समीक्षा

UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र ने कहा कि नियमों की समीक्षा की जा रही है। CJI सूर्यकांत ने कहा कि नीति ऐसी होनी चाहिए जिससे सभी युवा संतुष्ट हों।

नई दिल्ली: विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से बनाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर विवाद जारी है। इन नियमों के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह 2026 के नए नियमों की दोबारा समीक्षा कर रही है। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि नियमों में किसी भी वर्ग के छात्रों के मन में असंतोष या भेदभाव की भावना पैदा न हो।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ को बताया कि यूजीसी के नए नियम फिलहाल पुनर्विचार के अधीन हैं। इस पर CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि कोई भी नीति ऐसी होनी चाहिए, जिससे सभी युवा संतुष्ट महसूस करें।

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?

20 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार यूजीसी के नए नियमों पर नए सिरे से विचार कर रही है। इसका उद्देश्य नियमों को इस तरह तैयार करना है कि छात्रों की चिंताओं का समाधान हो और किसी भी वर्ग में असंतोष या आशंका की स्थिति न बने।

सरकार की ओर से यह भी संकेत दिया गया कि नियमों की समीक्षा के लिए समिति गठित करने जैसे विकल्प पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, समिति के गठन को लेकर अभी किसी अंतिम फैसले की पुष्टि नहीं हुई है।

इस मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ कर रही थी। अदालत ने UGC को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं को अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया।

29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी नए नियमों पर रोक

UGC ने 13 जनवरी 2026 को ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना) विनियम, 2026’ अधिसूचित किए थे। इनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान और अन्य आधारों पर होने वाले भेदभाव को रोकना तथा शिकायतों के समाधान के लिए संस्थागत व्यवस्था मजबूत करना था।

हालांकि, नियमों के कुछ प्रावधानों को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों और अन्य याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति जताई। उनका तर्क था कि जातिगत भेदभाव की परिभाषा में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का विशेष उल्लेख होने से सामान्य वर्ग के छात्रों को पर्याप्त संरक्षण नहीं मिल पाएगा।

इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को नए नियमों को अगले आदेश तक स्थगित कर दिया था। अदालत ने प्रथम दृष्टया कुछ प्रावधानों में अस्पष्टता और उनके दुरुपयोग की आशंका जताई थी। साथ ही, 2012 के यूजीसी नियमों को अगले आदेश तक लागू रखने का निर्देश दिया था।

नियमों को लेकर क्यों उठे सवाल?

विवाद का एक प्रमुख केंद्र नए नियमों के विनियम 3(1)(c) में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस प्रावधान में SC, ST और OBC समुदायों के सदस्यों के खिलाफ जाति या जनजाति के आधार पर होने वाले भेदभाव का उल्लेख है, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों को इसी तरह के भेदभाव से संरक्षण देने की व्यवस्था स्पष्ट नहीं है।

दूसरी ओर, नए नियमों का समर्थन करने वाले पक्ष का तर्क है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में वंचित और कमजोर वर्गों के छात्रों को भेदभाव से बचाने के लिए प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था जरूरी है। इस मामले में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की ओर से भी संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था की मांग की गई है।

अब आगे क्या होगा?

केंद्र सरकार की समीक्षा और सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बाद अब सबकी नजर नए नियमों के संशोधित स्वरूप और अदालत के अगले निर्देशों पर है। फिलहाल 2026 के नए यूजीसी नियम स्थगित हैं और 2012 के नियम लागू हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से यह स्पष्ट है कि नियम बनाते समय सामाजिक समानता, भेदभाव से सुरक्षा और सभी वर्गों के छात्रों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। अब देखना होगा कि केंद्र सरकार समीक्षा के बाद क्या बदलाव करती है और नए नियमों को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति क्या बनती है।