Pune News: महाराष्ट्र के पुणे स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) की लाइब्रेरी में उमर खालिद की पीएचडी रिसर्च पर आधारित किताब को लेकर विवाद सामने आया है। सोशल मीडिया पर किताब को लाइब्रेरी में रखे जाने पर आपत्ति जताई गई। इसके बाद किताब को लाइब्रेरी से हटाए जाने की खबर सामने आई है। किताब आदिवासी समुदायों के इतिहास, ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था और सत्ता संबंधों पर केंद्रित है।
IISER की लाइब्रेरी में किताब को लेकर क्यों हुआ विवाद?
पुणे स्थित IISER केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाला विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान है। यहां की श्रीनिवास रामानुजन लाइब्रेरी में उमर खालिद की रिसर्च पर आधारित किताब रखी गई थी।
किताब को लेकर सोशल मीडिया पर आपत्तियां जताई गईं। इसके बाद इसे लाइब्रेरी से वापस लिए जाने की खबर सामने आई। हालांकि, किताब को हटाने के पीछे संस्थान का आधिकारिक कारण क्या था और यह फैसला किस प्रक्रिया के तहत लिया गया, इस बारे में स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है।
क्या है उमर खालिद की किताब का नाम?
उमर खालिद की रिसर्च पर आधारित किताब का नाम ‘Fractured Communities: Adivasi Histories and the Politics of Power’ है। यह किताब झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र में आदिवासी समुदायों के इतिहास और उनके सामाजिक-राजनीतिक संबंधों का अध्ययन करती है।
किताब में मुख्य रूप से इन विषयों पर चर्चा की गई है:
- सिंहभूम क्षेत्र के आदिवासी समुदायों का इतिहास।
- ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था।
- आदिवासी समाज में सत्ता और प्रभाव के संबंध।
- समुदायों के बीच सामाजिक एवं राजनीतिक बदलाव।
यह रिसर्च आदिवासी इतिहास और सत्ता संरचनाओं को समझने के अकादमिक प्रयास के तौर पर देखी जाती है।
JNU में 2018 में जमा की थी थीसिस
उमर खालिद ने अपनी पीएचडी थीसिस वर्ष 2018 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में जमा की थी। उन्हें वर्ष 2019 में पीएचडी की डिग्री मिली थी। इसी शोध पर आधारित किताब को लेकर अब पुणे के IISER की लाइब्रेरी में विवाद सामने आया है।
किसी अकादमिक पुस्तक को लाइब्रेरी में शामिल करने या हटाने से जुड़े फैसले में संस्थान की लाइब्रेरी नीति और संबंधित प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। इस मामले में संस्थान की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने आने पर विवाद की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
JNU में ‘उमर खालिद को रिहा करो’ के नारे लिखने का आरोप
इस विवाद से एक दिन पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय परिसर में कथित नारों को लेकर भी राजनीतिक और छात्र संगठनों के बीच विवाद सामने आया था।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर ‘उमर खालिद को रिहा करो’ और ‘नक्सलबाड़ी जिंदाबाद’ जैसे नारे लिखे गए। संगठन ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मामले की जांच कराने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की।
ABVP की JNU इकाई ने अपने बयान में वामपंथी छात्र संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं पर नारे लिखने का आरोप लगाया। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जिम्मेदार लोगों की पहचान को लेकर आधिकारिक जानकारी जरूरी है।
सावरकर के चित्र के पास भी आपत्तिजनक टिप्पणी लिखने का दावा
ABVP ने यह भी दावा किया कि परिसर में वीडी सावरकर के चित्र के पास आपत्तिजनक टिप्पणियां लिखी गईं। संगठन ने इस घटना पर आपत्ति जताते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन से कार्रवाई की मांग की।
फिलहाल इन आरोपों को संगठन के दावों के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की जांच या आधिकारिक प्रतिक्रिया से ही स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में भी प्रदर्शन को लेकर चर्चा
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब दिल्ली स्थित जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र संघ की बहाली की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन की खबरें भी सामने आई थीं।
प्रदर्शन और परिसर में नारेबाजी को लेकर अलग-अलग छात्र संगठनों के बीच मतभेद देखने को मिल रहे हैं। जामिया में ऑनलाइन कक्षाएं संचालित किए जाने की खबर भी सामने आई थी। हालांकि, ऑनलाइन कक्षाओं के फैसले और उसके कारणों की पुष्टि विश्वविद्यालय के आधिकारिक आदेश से की जानी चाहिए।
किताब से शुरू हुआ विवाद, अकादमिक स्वतंत्रता पर भी उठे सवाल
IISER की लाइब्रेरी में उमर खालिद की किताब को लेकर उठा विवाद अब अकादमिक सामग्री के चयन, सोशल मीडिया पर विरोध और संस्थानों की लाइब्रेरी नीति जैसे मुद्दों को सामने लाता है।
इस मामले में अहम सवाल यह है कि किताब को हटाने का फैसला किस आधार पर लिया गया और क्या संस्थान ने इस संबंध में कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया है। वहीं, JNU में कथित नारेबाजी को लेकर ABVP के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि भी जरूरी है।
फिलहाल, किताब को लेकर विवाद और छात्र संगठन के आरोपों को अलग-अलग तथ्यों के रूप में देखना जरूरी है। संस्थानों की आधिकारिक प्रतिक्रिया और जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की तस्वीर स्पष्ट होगी।

