दिल्ली में कब थमेगा इमारतों के ढहने का सिलसिला? एक साल में 6 बड़े हादसे, 35 लोगों की मौत

दिल्ली में इमारत गिरने के हादसे लगातार चिंता बढ़ा रहे हैं। अप्रैल 2025 से अब तक 6 बड़े हादसों में 35 मौतों का दावा है। जानें सत्य निकेतन से मुस्तफाबाद तक पूरा मामला।

दिल्ली में जर्जर और निर्माणाधीन इमारतों के ढहने की घटनाएं लगातार चिंता बढ़ा रही हैं। अप्रैल 2025 से अब तक राजधानी में ऐसे 6 बड़े हादसों का जिक्र सामने आया है, जिनमें कुल 35 लोगों की जान जाने का दावा किया गया है। सत्य निकेतन हादसे ने एक बार फिर इमारतों की सुरक्षा, अवैध निर्माण और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

दिल्ली देशभर के लाखों लोगों के सपनों का शहर है। बड़ी संख्या में छात्र और युवा बेहतर शिक्षा और रोजगार की तलाश में यहां आते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले हजारों छात्र पीजी, किराये के कमरों और हॉस्टल में रहते हैं। ऐसे में जब किसी जर्जर इमारत के अचानक ढहने से लोगों की जान जाती है, तो यह सिर्फ एक हादसा नहीं बल्कि शहरी सुरक्षा व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।

राजधानी में हालिया सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे ने इसी चिंता को फिर सामने ला दिया है। बताया जा रहा है कि पीजी के तौर पर इस्तेमाल हो रही इमारत अचानक भरभराकर गिर गई और कई लोग मलबे में दब गए। हादसे के बाद लंबे समय तक राहत और बचाव अभियान चलाया गया। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, इस घटना में 6 लोगों की मौत की खबर सामने आई।

हालांकि, हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि इमारत पहले से जर्जर थी तो उसकी हालत पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

सत्य निकेतन हादसे ने फिर खड़े किए सुरक्षा पर सवाल

सत्य निकेतन दिल्ली यूनिवर्सिटी के आसपास रहने वाले छात्रों के बीच जाना-पहचाना इलाका है। यहां बड़ी संख्या में छात्र पीजी और किराये के कमरों में रहते हैं।

बताया जा रहा है कि हादसे का शिकार हुई इमारत करीब 30 साल पुरानी थी और उसकी हालत खराब थी। आसपास की कुछ अन्य इमारतों की स्थिति को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।

यह आरोप भी सामने आया है कि इलाके में कई इमारतों में समय के साथ अनधिकृत तरीके से निर्माण बढ़ाया गया। यदि ऐसा था, तो सवाल उठता है कि निर्माण के दौरान संबंधित विभागों की निगरानी कहां थी?

हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक जांच और जिम्मेदारी तय होने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी।

जुलाई में रोहिणी में ढही चार मंजिला निर्माणाधीन इमारत

सत्य निकेतन से पहले भी दिल्ली में इमारत गिरने की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

जुलाई 2026 में रोहिणी इलाके में एक चार मंजिला निर्माणाधीन इमारत ढह गई थी। हादसे में तीन मजदूरों की मौत हो गई, जबकि एक व्यक्ति घायल हुआ था।

बताया गया कि 8 जुलाई की शाम दिल्ली पुलिस को घटना की सूचना मिली। मौके पर पहुंचने पर पुलिस ने देखा कि निर्माणाधीन इमारत पूरी तरह ढह चुकी थी और मलबा सड़क पर फैल गया था।

स्थानीय लोगों ने पुलिस को बताया कि कुछ मजदूर इमारत में काम कर रहे थे और उनके मलबे में दबे होने की आशंका थी। इसके बाद राहत एवं बचाव अभियान शुरू किया गया, लेकिन चार मजदूरों में से तीन की जान नहीं बचाई जा सकी।

सैदुलाजाब में इमारत गिरने से 6 लोगों की मौत

30 मई को दिल्ली के सैदुलाजाब इलाके में भी पांच मंजिला इमारत ढहने की घटना सामने आई थी। यह इलाका साकेत मेट्रो स्टेशन के आसपास बताया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, इमारत गिरकर पास की एक कैंटीन पर जा गिरी थी, जहां उस समय लोग मौजूद थे। हादसे में 6 लोगों की मौत की खबर सामने आई, जबकि करीब 10 लोगों को रेस्क्यू किए जाने की जानकारी दी गई।

इस घटना के बाद भी इमारत के निर्माण और उसकी वैधता को लेकर सवाल उठे थे।

वेलकम में जर्जर इमारत बनी थी जानलेवा

जुलाई 2025 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के वेलकम इलाके में एक चार मंजिला जर्जर इमारत ढहने की घटना हुई थी।

बताया गया कि इमारत काफी पुरानी और कमजोर थी तथा उसमें कई लोग रह रहे थे। अचानक इमारत के गिरने से कई लोग इसकी चपेट में आ गए और जान-माल का भारी नुकसान हुआ।

यह घटना भी इस सवाल को सामने लाई कि पुरानी और खतरनाक इमारतों की पहचान कर उन्हें खाली कराने या उनकी मरम्मत सुनिश्चित करने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

पहाड़गंज में बेसमेंट ढहने से 3 मजदूरों की मौत

17 मई 2025 को दिल्ली के पहाड़गंज इलाके में एक निर्माणाधीन इमारत का बेसमेंट ढहने से तीन मजदूरों की मौत हो गई थी।

बताया गया कि तेज आंधी और बारिश के बाद निर्माण स्थल की दीवार कमजोर हुई और वह ढह गई। मलबे में दबने से तीन मजदूरों की जान चली गई।

इस तरह के हादसे सबसे ज्यादा उन मजदूरों और कामगारों को प्रभावित करते हैं, जो निर्माण स्थलों पर बिना पर्याप्त सुरक्षा के काम करने को मजबूर होते हैं।

मुस्तफाबाद में इमारत गिरने से गई थी 11 लोगों की जान

18 अप्रैल 2025 को मुस्तफाबाद में चार मंजिला इमारत ढहने की घटना ने राजधानी को झकझोर दिया था। इस हादसे में 11 लोगों की मौत होने की खबर सामने आई थी।

घटना के बाद इलाके में अवैध निर्माण और इमारतों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे थे। कार्रवाई की बात भी सामने आई थी।

लेकिन यही सवाल आज भी कायम है—अगर कोई निर्माण नियमों के खिलाफ है या कोई इमारत लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन चुकी है, तो कार्रवाई हादसे के बाद ही क्यों होती है?

सवाल सिर्फ हादसों का नहीं, सिस्टम की निगरानी का भी है

दिल्ली में इमारतों के गिरने की घटनाएं केवल एक-एक करके होने वाले हादसे नहीं हैं। बार-बार ऐसी घटनाओं का सामने आना शहरी नियोजन, बिल्डिंग सेफ्टी, अवैध निर्माण की निगरानी और जर्जर इमारतों की पहचान जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा की जरूरत बताता है।

खासकर उन इलाकों में जहां छात्र पीजी में रहते हैं, बड़ी संख्या में मजदूर निर्माण स्थलों पर काम करते हैं या घनी आबादी मौजूद है, वहां सुरक्षा मानकों की नियमित जांच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

सवाल यह भी है कि क्या संबंधित एजेंसियों के पास जर्जर इमारतों की पहचान और उनकी निगरानी के लिए प्रभावी व्यवस्था है? क्या अवैध तरीके से बढ़ाए गए निर्माण पर समय रहते कार्रवाई होती है? और सबसे अहम—क्या प्रशासन हादसे के बाद कार्रवाई करने के बजाय हादसा होने से पहले खतरे को पहचानने की व्यवस्था मजबूत कर पाएगा?

सत्य निकेतन से लेकर मुस्तफाबाद तक हुई घटनाओं ने एक बार फिर दिल्ली के सामने यही सवाल रखा है—आखिर राजधानी कब सबक लेगी?