ईरान-इजराइल संघर्ष की नई लहर: विश्व शांति के लिए बढ़ता खतरा”

26 जुलाई 2025 को, पश्चिम एशिया एक बार फिर संकट के मुहाने पर खड़ा है। ईरान और इज़राइल के बीच छिड़ा ताजा संघर्ष अब सीमित सैन्य झड़पों से आगे निकलकर व्यापक युद्ध की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों की सेनाओं ने एक-दूसरे के ठिकानों पर मिसाइल हमले किए हैं, जिससे क्षेत्रीय तनाव के साथ-साथ वैश्विक चिंताओं में भी तेजी आई है।

इस लेख में हम जानेंगे इस संघर्ष के मुख्य कारण, वर्तमान स्थिति, वैश्विक प्रतिक्रियाएं और भारत सहित अन्य देशों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव।

ईरान-इजराइल संघर्ष: पृष्ठभूमि
ईरान और इज़राइल के बीच शत्रुता नई नहीं है। यह विवाद दशकों पुराना है, जो मुख्य रूप से निम्न कारणों पर आधारित है:

परमाणु कार्यक्रम:
इज़राइल का आरोप है कि ईरान गुप्त रूप से परमाणु हथियार विकसित कर रहा है, जबकि ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।

सैन्य गुट:
ईरान द्वारा लेबनान के हिज़्बुल्ला और ग़ज़ा के हमास को समर्थन दिया जाता है, जिन्हें इज़राइल “आतंकी संगठन” मानता है।

साइबर युद्ध:
दोनों देशों ने एक-दूसरे पर कई साइबर हमले किए हैं। 2021 में इज़राइल द्वारा ईरान की न्यूक्लियर फैसिलिटी पर साइबर अटैक हुआ था।

2025 की नई घटनाएं
15 जुलाई 2025:
ईरान ने दावा किया कि उसके एक सैन्य वैज्ञानिक को इज़राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने तेहरान में मार गिराया।

इसके जवाब में ईरान ने सीरिया में इज़राइल समर्थित ठिकानों पर मिसाइल दागे।

20 जुलाई 2025:
इज़राइल ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इराक और सीरिया में ईरानी ठिकानों पर एयरस्ट्राइक की।

इस हमले में 19 लोग मारे गए, जिनमें ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के अधिकारी भी शामिल थे।

25 जुलाई 2025:
ईरान ने सीधा मिसाइल हमला करते हुए तेल अवीव के पास एक सैन्य हवाई अड्डे को निशाना बनाया।

इज़राइल ने तुरंत जवाब देते हुए बशर अल-असद के नियंत्रण वाले सीरियाई क्षेत्र में ईरानी सैन्य अड्डे पर बड़ी कार्रवाई की।

वैश्विक प्रतिक्रिया
संघर्ष के तेज़ होते ही विश्व समुदाय सक्रिय हो गया है। संयुक्त राष्ट्र (UN), अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ (EU), चीन और भारत सहित कई देशों ने संयम बरतने की अपील की है।

अमेरिका:
अमेरिकी राष्ट्रपति केविन ब्लैंकेट ने कहा:
“हम मध्य पूर्व में और अधिक युद्ध नहीं चाहते। दोनों देशों को बातचीत की टेबल पर आना चाहिए।”

अमेरिका ने अपने नागरिकों को इज़राइल और ईरान छोड़ने की सलाह दी है।

रूस:
रूस ने कहा कि वह इस संघर्ष को “डायरेक्ट प्रॉक्सी वॉर” मानता है और पश्चिम को भी संयम बरतने की सलाह दी है।

भारत:
भारत ने “गंभीर चिंता” जताई है और अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए विशेष विमान भेजे हैं।

विदेश मंत्री डॉ. सुभाष चौधरी ने कहा:
“हम दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील करते हैं। यह संघर्ष वैश्विक अस्थिरता को जन्म देगा।”

संघर्ष के परिणाम और संभावित खतरे
1. तेल की कीमतों में भारी उछाल
ब्रेंट क्रूड की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच चुकी है।

इससे भारत जैसे आयातक देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।

2. वैश्विक सप्लाई चेन पर असर
होरमुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जिससे दुनिया का 20% तेल गुजरता है, अब सैन्य निगरानी में है।

इससे व्यापार मार्ग बाधित होने की आशंका है।

3. साइबर युद्ध का विस्तार
दोनों देश साइबर युद्ध के माध्यम से एक-दूसरे की ऊर्जा, रक्षा और संचार प्रणाली को निशाना बना रहे हैं।

इस युद्ध में तृतीय पक्ष (third party) देशों पर भी प्रभाव संभव है।

भारत पर प्रभाव
भारत का ईरान और इज़राइल दोनों से सैन्य, ऊर्जा और व्यापारिक संबंध हैं। यह संघर्ष भारत के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति बनाता है:

तेल आयात महंगा हो गया है।

ईरान के चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट पर अनिश्चितता बढ़ी है।

भारतीय नागरिकों की सुरक्षा एक बड़ी प्राथमिकता बन गई है।

इज़राइल से रक्षा उपकरणों का आयात समय पर नहीं हो पा रहा।

26 जुलाई को एयर इंडिया ने 2 फ्लाइट्स में 500 भारतीय नागरिकों को तेल अवीव से सुरक्षित निकाला।

विशेषज्ञों की राय
प्रो. शीतल व्यास, अंतरराष्ट्रीय मामलों की विशेषज्ञ (JNU):
“यह संघर्ष धीरे-धीरे एक बड़ी क्षेत्रीय जंग में तब्दील हो सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया पर होगा। अगर अमेरिका या रूस जैसे शक्तिशाली देश इसमें घुसते हैं तो यह वैश्विक युद्ध का रूप ले सकता है।”

ब्रिगेडियर (रिटा.) के.एस. पांडे:
“भारत को अब ‘कूटनीतिक संतुलन’ साधने की ज़रूरत है। न ईरान नाराज़ हो, न इज़राइल। दोनों भारत के लिए रणनीतिक साझेदार हैं।”

निष्कर्ष
26 जुलाई 2025, एक ऐसा दिन है जब दुनिया शांति की उम्मीद में टकटकी लगाए देख रही है। ईरान और इज़राइल का यह संघर्ष एक बार फिर यह साबित करता है कि अहंकार और सत्ता की लड़ाई में निर्दोष आम नागरिक सबसे ज़्यादा पीड़ित होते हैं।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय को चाहिए कि वह न केवल कड़ी बयानबाजी करे, बल्कि ठोस कूटनीतिक पहल करे। समय की मांग है संयम, संवाद और समाधान।