देशभर में चुनाव आयोग (ECI) आज वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया की घोषणा करने वाला है। लेकिन इस घोषणा से ठीक पहले ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ऐसा कदम उठा लिया, जिससे राज्य की राजनीति में जबरदस्त हलचल मच गई है। ममता सरकार ने सोमवार को राज्य की नौकरशाही में बड़ा फेरबदल करते हुए कई जिलों के जिला मजिस्ट्रेट (DM) का तबादला कर दिया।
ममता सरकार का बड़ा प्रशासनिक फेरबदल
पश्चिम बंगाल सरकार ने सोमवार को जारी आदेश में कई जिलों के डीएम का तबादला कर दिया है। कुछ जिलों में नए डीएम की नियुक्ति की गई है, जबकि कुछ अफसरों को नई जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। यह कदम चुनाव आयोग की SIR घोषणा से ठीक पहले उठाया गया है।
सूत्रों के अनुसार, जिन जिलों में जिला मजिस्ट्रेट बदले गए हैं, उनमें प्रमुख रूप से —
- उत्तर 24 परगना
- दक्षिण 24 परगना
- कूचबिहार
- मुर्शिदाबाद
- पुरुलिया
- दार्जीलिंग
- मालदा
- बीरभूम
- झारग्राम
- पूर्व मेदिनीपुर
शामिल हैं।
यह आदेश जारी होते ही पूरे राज्य के प्रशासनिक ढांचे में हड़कंप मच गया।
ममता का ‘टाइमिंग गेम’: चुनाव आयोग से पहले की चाल
जानकारों का कहना है कि ममता बनर्जी ने यह कदम बेहद रणनीतिक तरीके से उठाया है। दरअसल, चुनाव आयोग जब SIR प्रक्रिया की घोषणा कर देता है, तो उसके बाद किसी भी जिले के डीएम या प्रशासनिक अधिकारी का तबादला नहीं किया जा सकता।
ऐसे में नबन्ना (राज्य सचिवालय) ने यह आदेश आयोग की घोषणा से ठीक पहले जारी कर दिया, ताकि प्रशासनिक नियंत्रण राज्य सरकार के पास बना रहे। इसे कई राजनीतिक विश्लेषक “ममता बनर्जी का प्री-एंप्टिव मूव” मान रहे हैं।
विपक्ष का आरोप: “चुनावी तैयारी की जा रही है”
इस कदम के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में सियासी तापमान तेजी से बढ़ गया है। विपक्षी दलों — भारतीय जनता पार्टी (BJP) और कांग्रेस — ने ममता सरकार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि यह बदलाव चुनावी रणनीति का हिस्सा है।
BJP नेताओं ने कहा कि ममता बनर्जी प्रशासनिक मशीनरी को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश कर रही हैं ताकि आने वाले चुनावों में राजनीतिक लाभ उठाया जा सके। उनका कहना है कि डीएम और अन्य अफसर चुनाव प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाते हैं, इसलिए यह बदलाव “चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश” है।
सरकार का बचाव: “यह नियमित प्रक्रिया है”
वहीं, राज्य सरकार की ओर से सफाई दी गई है कि यह बदलाव “नियमित प्रशासनिक फेरबदल” है और इसका चुनाव आयोग की किसी प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं है। राज्य के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इस तरह के स्थानांतरण प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए समय-समय पर किए जाते हैं।
उन्होंने कहा, “यह पूरी तरह से सामान्य प्रक्रिया है। इसका SIR या किसी राजनीतिक उद्देश्य से कोई संबंध नहीं है।”
SIR प्रक्रिया क्या है?
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर की जाने वाली एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें मतदाता सूची (voter list) का पुनरीक्षण किया जाता है।
इसमें मृत मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं, नए योग्य मतदाताओं को जोड़ा जाता है, और डेटा को अद्यतन किया जाता है ताकि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी हो सकें।
चुनाव आयोग जब SIR की घोषणा करता है, तो संबंधित राज्य सरकारों और जिला प्रशासन को सख्त दिशा-निर्देश दिए जाते हैं कि इस प्रक्रिया के दौरान किसी भी प्रकार के तबादले या बदलाव न किए जाएं।
असम और हरियाणा का रिएक्शन
इस बीच, SIR पर देशभर में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आने लगी हैं।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा,
“हम जानते हैं कि भारत का चुनाव आयोग आज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहा है। अगर SIR की घोषणा देशभर में की जाती है, तो हम उसका स्वागत करेंगे।”
वहीं हरियाणा के मंत्री अनिल विज ने चुनाव आयोग की तारीफ करते हुए कहा,
“चुनाव आयोग बेहतरीन काम कर रहा है। मतदाता सूचियों को सही करना बहुत जरूरी है ताकि कोई गड़बड़ी न हो। आयोग अपने काम को ईमानदारी और निष्पक्षता से कर रहा है।”
बंगाल की राजनीति में बढ़ा तनाव
SIR की घोषणा से पहले हुआ यह “प्रशासनिक reshuffle” अब पश्चिम बंगाल की सियासत में गर्म मुद्दा बन गया है। विपक्ष जहां इसे “राजनीतिक चाल” बता रहा है, वहीं ममता बनर्जी इसे “नियमित प्रक्रिया” कहकर टाल रही हैं।
लेकिन इतना तय है कि इस कदम ने चुनाव आयोग से लेकर राजनीतिक हलकों तक हलचल जरूर मचा दी है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या चुनाव आयोग इस फैसले पर कोई प्रतिक्रिया देता है या फिर ममता बनर्जी का यह ‘खेला’ बिना किसी रुकावट के सफल रहता है।
चुनाव आयोग की SIR घोषणा से ठीक पहले ममता बनर्जी का यह प्रशासनिक कदम पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आया है। एक ओर विपक्ष इसे चुनावी तैयारी मान रहा है, तो दूसरी ओर सरकार इसे सामान्य प्रक्रिया बता रही है। लेकिन सच्चाई यह है कि बंगाल में एक बार फिर ‘खेला होबे’ का नारा सियासत के केंद्र में लौट आया है।

