Journalist Protection Laws: भारत में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कौन-से कानून? जानें अधिकार

भारत में पत्रकारों को संविधान के अनुच्छेद 19, BNS, प्रेस काउंसिल एक्ट और महाराष्ट्र के विशेष कानून से क्या सुरक्षा मिलती है? जानें पत्रकारों के कानूनी अधिकार और शिकायत के तरीके।

Journalist Protection Laws in India: पत्रकार लोकतंत्र में जनता तक सूचनाएं पहुंचाने और सत्ता से सवाल पूछने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन खबरों की रिपोर्टिंग के दौरान उन्हें धमकी, मारपीट, दबाव और ऑनलाइन उत्पीड़न जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत में पत्रकारों के लिए कोई एक व्यापक केंद्रीय सुरक्षा कानून नहीं है, लेकिन संविधान, भारतीय न्याय संहिता (BNS), प्रेस काउंसिल एक्ट और कुछ राज्यों के विशेष कानून उन्हें कानूनी संरक्षण देते हैं।

नई दिल्ली: पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। भ्रष्टाचार, अपराध, सरकारी नीतियों और सामाजिक मुद्दों को जनता के सामने लाने में पत्रकारों की अहम भूमिका होती है। कई बार इस जिम्मेदारी को निभाने के दौरान पत्रकारों को धमकियों, हमलों और कानूनी दबाव का सामना करना पड़ता है।

पत्रकारों की सुरक्षा और उनके खिलाफ अपराध करने वालों को सजा दिलाने की मांग को लेकर हर साल 2 नवंबर को पत्रकारों के खिलाफ अपराधों की दंडमुक्ति समाप्त करने का अंतरराष्ट्रीय दिवस (International Day to End Impunity for Crimes against Journalists) मनाया जाता है।

इस मौके पर जानना जरूरी है कि भारत में पत्रकारों को कौन-कौन से संवैधानिक और कानूनी अधिकार हासिल हैं और हमला या धमकी मिलने पर किन कानूनों के तहत कार्रवाई हो सकती है।

1. संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

भारतीय संविधान में पत्रकारों के लिए अलग से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार नहीं बनाया गया है। उन्हें यह अधिकार देश के अन्य नागरिकों की तरह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) से मिलता है।

इसके तहत नागरिकों को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया गया है। इसी अधिकार के दायरे में प्रेस की स्वतंत्रता भी आती है।

हालांकि, यह अधिकार असीमित नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 19(2) देश की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार, मानहानि और न्यायालय की अवमानना जैसे आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।

इसका मतलब है कि पत्रकार स्वतंत्र रूप से खबरें प्रकाशित कर सकते हैं, लेकिन उन्हें कानून के दायरे और अपनी पेशेवर जिम्मेदारियों का भी पालन करना होता है।

2. भारतीय न्याय संहिता (BNS): धमकी और हमले पर कार्रवाई

1 जुलाई 2024 से भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 लागू है। पत्रकारों को धमकी देने, रास्ता रोकने, जबरन वसूली करने या शारीरिक हमला करने जैसी घटनाओं में अपराध की प्रकृति के अनुसार इसकी अलग-अलग धाराएं लागू हो सकती हैं।

कुछ प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं:

BNS की धारा                                                               किस अपराध से संबंधित है
धारा 126                                                           गलत तरीके से रास्ता रोकना (Wrongful Restraint)
धारा 115                                                           स्वेच्छा से चोट पहुंचाना (Voluntarily Causing Hurt)
धारा 351                                                          आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation)
धारा 308                                                           जबरन वसूली (Extortion)
धारा 352                                                           शांति भंग कराने के इरादे से जानबूझकर अपमान करना

उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति किसी पत्रकार को खबर प्रकाशित करने से रोकने के लिए जान से मारने या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकी देता है, तो परिस्थितियों के आधार पर BNS की धारा 351 के तहत कार्रवाई हो सकती है।

इसी तरह, खबर दबाने के लिए धमकी देकर पैसे या संपत्ति की मांग की जाती है, तो धारा 308 के तहत जबरन वसूली का मामला बन सकता है।

ध्यान रहे कि कौन-सी धारा लागू होगी, यह घटना के वास्तविक तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करता है।

3. प्रेस काउंसिल एक्ट, 1978: प्रेस की स्वतंत्रता का संरक्षण

पत्रकारों और समाचार पत्रों की स्वतंत्रता तथा पत्रकारिता के मानकों को बनाए रखने के उद्देश्य से संसद ने प्रेस काउंसिल एक्ट, 1978 बनाया।

इसी कानून के तहत प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) की स्थापना की गई। यह एक वैधानिक और अर्ध-न्यायिक संस्था है।

प्रेस काउंसिल एक्ट की धारा 13 के तहत परिषद का उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखना और समाचार पत्रों तथा समाचार एजेंसियों के मानकों को बेहतर बनाना है।

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पास पत्रकारों या समाचार संस्थानों की ओर से प्रेस की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप, पत्रकारों पर उनके काम के कारण हुए शारीरिक हमले और प्रेस के कामकाज में बाधा से जुड़ी शिकायतें दर्ज कराने की व्यवस्था है।

हालांकि, इसकी अधिकारिता मुख्य रूप से प्रिंट मीडिया तक सीमित है। यह पुलिस या आपराधिक अदालत की तरह हमलावरों को जेल की सजा देने वाली संस्था नहीं है।
India Code+2

4. महाराष्ट्र में पत्रकारों के लिए विशेष सुरक्षा कानून

देश में कुछ राज्यों ने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए विशेष कानूनी प्रावधान किए हैं। इनमें महाराष्ट्र का कानून प्रमुख है।

महाराष्ट्र सरकार ने Maharashtra Media Persons and Media Institutions (Prevention of Violence and Damage or Loss to Property) Act, 2017 बनाया, जिसे 2019 में महाराष्ट्र अधिनियम संख्या 29 के रूप में लागू किया गया।

इस कानून का उद्देश्य पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ हिंसा तथा उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं को रोकना है।

इस कानून के प्रमुख प्रावधान हैं:

  • मीडिया कर्मियों के खिलाफ हिंसा पर प्रतिबंध।
  • अपराध साबित होने पर तीन साल तक की जेल या 50 हजार रुपये तक जुर्माना अथवा दोनों का प्रावधान।
  •  मामले की जांच DSP रैंक से नीचे का अधिकारी नहीं करेगा।
  • अपराध को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाया गया है।
  • दोषी पाए जाने पर संपत्ति के नुकसान और चिकित्सा खर्च की भरपाई का भी प्रावधान है।

यह कानून महाराष्ट्र में लागू है। इसे पूरे देश में लागू केंद्रीय कानून नहीं समझना चाहिए।
India Code+1

5. वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट: पत्रकारों के सेवा संबंधी अधिकार

पत्रकारों के अधिकारों की चर्चा में Working Journalists and Other Newspaper Employees (Conditions of Service) and Miscellaneous Provisions Act, 1955 का भी उल्लेख जरूरी है।

यह कानून मुख्य रूप से समाचार पत्रों और उनसे जुड़े कर्मचारियों की सेवा शर्तों, वेतन, कामकाज और अन्य रोजगार संबंधी मामलों से जुड़ा था।

हालांकि, इसे पत्रकारों पर होने वाले हमलों से बचाने वाला विशेष आपराधिक सुरक्षा कानून नहीं माना जाना चाहिए। पत्रकारों के रोजगार और सेवा संबंधी अधिकारों का कानूनी ढांचा अलग विषय है।

6. डिजिटल उत्पीड़न और ऑनलाइन धमकियों पर IT Act

आज पत्रकारों को केवल फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी धमकियों, फर्जी पहचान, निजी जानकारी सार्वजनिक करने और ऑनलाइन उत्पीड़न जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

ऐसे मामलों में घटना की प्रकृति के अनुसार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और भारतीय न्याय संहिता के प्रावधान लागू हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए:

  • किसी का अकाउंट हैक करने या अनधिकृत तरीके से कंप्यूटर सिस्टम तक पहुंचने पर IT Act की धारा 66 लागू हो सकती है।
  • निजी तस्वीर या वीडियो को बिना अनुमति सार्वजनिक करने के कुछ मामलों में धारा 66E लागू हो सकती है।
  • अश्लील सामग्री के इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशन या प्रसारण से जुड़े मामलों में धारा 67 और संबंधित प्रावधान लागू हो सकते हैं।

हर ऑनलाइन गाली, आलोचना या असहमति अपने आप IT Act के तहत अपराध नहीं बनती। कार्रवाई इस बात पर निर्भर करती है कि घटना में कौन-सा कानूनी अपराध हुआ है।

7. पत्रकार पर हमला होने पर क्या करें?

यदि किसी पत्रकार को रिपोर्टिंग के दौरान धमकी दी जाती है या उस पर हमला होता है, तो कानूनी कार्रवाई के लिए ये कदम उठाए जा सकते हैं:

1. पुलिस में शिकायत दर्ज कराएं: घटना की जानकारी नजदीकी थाने में दें और जरूरत के अनुसार FIR दर्ज कराने की मांग करें।

2. सबूत सुरक्षित रखें: वीडियो, ऑडियो, फोटो, धमकी भरे मैसेज, ईमेल और सोशल मीडिया पोस्ट सुरक्षित रखें।

3. मेडिकल जांच कराएं: शारीरिक चोट लगने पर अस्पताल में जांच कराकर मेडिकल रिकॉर्ड सुरक्षित रखें।

4. वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत दें: कार्रवाई न होने पर पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क करें।

5. प्रेस काउंसिल में शिकायत करें: यदि मामला प्रिंट मीडिया की स्वतंत्रता या पत्रकार के काम में हस्तक्षेप से जुड़ा है, तो प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की शिकायत व्यवस्था का सहारा लिया जा सकता है।
गंभीर धमकी या हमले की स्थिति में कानूनी सलाह लेना भी उपयोगी हो सकता है।

8. 2 नवंबर को क्यों मनाया जाता है पत्रकारों की सुरक्षा का अंतरराष्ट्रीय दिवस?

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 2013 में प्रस्ताव A/RES/68/163 के जरिए हर साल 2 नवंबर को International Day to End Impunity for Crimes against Journalists मनाने की घोषणा की थी।

इस तारीख का संबंध 2 नवंबर 2013 को माली में दो फ्रांसीसी पत्रकारों की हत्या से है। रेडियो पत्रकार गिस्लेन डुपोंट (Ghislaine Dupont) और क्लाउड वेरलॉन (Claude Verlon) की रिपोर्टिंग के दौरान अपहरण के बाद हत्या कर दी गई थी।

इस दिवस का उद्देश्य पत्रकारों के खिलाफ होने वाले अपराधों की निष्पक्ष जांच, दोषियों को सजा और पत्रकारों के लिए सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने की मांग को मजबूत करना है।

UNESCO के अनुसार, 2006 से 2025 के बीच दुनियाभर में 1,600 से अधिक पत्रकार मारे गए और इनमें से लगभग छह में से पांच मामलों का न्यायिक समाधान नहीं हो सका।
UNESCO+2

भारत में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए क्या अलग केंद्रीय कानून जरूरी है?

भारत में पत्रकारों को संविधान और सामान्य आपराधिक कानूनों के तहत अधिकार और सुरक्षा मिलती है। इसके अलावा प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और कुछ राज्यों के विशेष कानून भी मौजूद हैं।

लेकिन पत्रकारों पर हमले, धमकियां और डिजिटल उत्पीड़न जैसी चुनौतियों को देखते हुए पत्रकार संगठनों और मीडिया जगत में एक व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था की मांग समय-समय पर उठती रही है।

एक प्रभावी व्यवस्था में पत्रकारों पर हमले की त्वरित जांच, शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई, डिजिटल सुरक्षा और दोषियों की जवाबदेही जैसे पहलुओं को शामिल किया जा सकता है।

पत्रकारों की सुरक्षा केवल किसी एक पेशे की सुरक्षा का सवाल नहीं है। यह जनता के सूचना पाने के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।