इजरायल-अमेरिका हमलों में खामेनेई की मौत के दावों के बीच भी डोनाल्ड ट्रंप का ‘रिजीम चेंज’ मिशन अधूरा? जानिए ईरान से अमेरिका को क्यों मिल रही है चुनौतीपूर्ण खबर।
Israel-Iran War News (2026): अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों के बाद ईरान में हालात बेहद तनावपूर्ण हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक 28 फरवरी 2026 को हुए हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई समेत कई शीर्ष नेताओं की मौत हो गई। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कथित ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) एजेंडे पर चर्चा तेज हो गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या सैन्य कार्रवाई के बावजूद अमेरिका का मूल उद्देश्य अब भी अधूरा है?
हमले के बाद भी क्यों नहीं बदले हालात?
अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर बड़े पैमाने पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए। इसके जवाब में ईरान ने भी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया।
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरानी हमलों में कुछ अमेरिकी सैनिकों की मौत और सैन्य ठिकानों को नुकसान की खबरें सामने आई हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि सीमित है।
क्या था अमेरिका का असली मकसद?
विश्लेषकों के मुताबिक, इस पूरे अभियान के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य माने जा रहे हैं:
- ईरान में सत्ता परिवर्तन (Regime Change)
- ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना
अमेरिका लंबे समय से ईरान पर परमाणु हथियार कार्यक्रम को लेकर संदेह जताता रहा है। हालांकि तेहरान ने आधिकारिक तौर पर परमाणु हथियार बनाने के आरोपों को खारिज किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वॉशिंगटन की रणनीति यह थी कि शीर्ष नेतृत्व पर प्रहार से ईरान के भीतर सत्ता के खिलाफ व्यापक विरोध भड़केगा और राजनीतिक बदलाव का रास्ता खुलेगा।
‘चार दिन’ से ‘चार हफ्ते’ तक
राष्ट्रपति ट्रंप ने शुरुआती बयान में संकेत दिया था कि संघर्ष सीमित अवधि का हो सकता है। लेकिन हालिया बयानों में उन्होंने माना कि हालात अपेक्षा से अधिक जटिल हैं और संघर्ष लंबा खिंच सकता है।
यह बदलाव दर्शाता है कि जमीन पर परिस्थितियां अमेरिकी आकलन से अलग दिशा में बढ़ रही हैं।
क्यों अधूरा माना जा रहा है मिशन?
1. व्यापक जनविद्रोह का अभाव
खामेनेई की कथित मौत के बाद भी ईरान में बड़े पैमाने पर सत्ता-विरोधी प्रदर्शन देखने को नहीं मिले।
2. जवाबी हमलों की क्षमता बरकरार
ईरान अब भी क्षेत्रीय स्तर पर जवाबी कार्रवाई कर रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि उसकी सैन्य और राजनीतिक संरचना पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुई है।
3. क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा
मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों पर खतरा बढ़ा है और संघर्ष के फैलने की आशंका बनी हुई है।
क्या बढ़ेगा क्षेत्रीय संकट?
मिडिल ईस्ट पहले ही कई भू-राजनीतिक तनावों से घिरा है। ऐसे में ईरान-अमेरिका-इजरायल टकराव का लंबा खिंचना वैश्विक तेल बाजार, सुरक्षा समीकरण और कूटनीतिक संतुलन पर असर डाल सकता है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर अब इस बात पर है कि क्या यह संघर्ष पूर्ण युद्ध में बदलेगा या कूटनीतिक प्रयासों से तनाव कम होगा।
अगर खामेनेई की मौत की खबरें सही साबित होती हैं, तब भी यह स्पष्ट है कि केवल शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाना सत्ता परिवर्तन की गारंटी नहीं देता। अमेरिका का कथित ‘रिजीम चेंज’ लक्ष्य फिलहाल अधूरा नजर आ रहा है।
ईरान की राजनीतिक संरचना और क्षेत्रीय समीकरणों को देखते हुए यह संघर्ष अभी लंबा चल सकता है। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि हालात कूटनीति की ओर मुड़ते हैं या और अधिक सैन्य टकराव की ओर।

