Indian Army Caste Census: क्या कभी हुई थी भारतीय सेना में जाति आधारित जनगणना? जानिए पूरी कहानी

क्या भारतीय सेना में कभी जाति आधारित जनगणना हुई है? जानिए ब्रिटिश काल के ‘मार्शल रेस’ सिस्टम, स्वतंत्रता के बाद भर्ती प्रक्रिया में बदलाव और आधुनिक भारतीय सेना की संरचना की पूरी कहानी।

नई दिल्ली | 10 नवंबर 2025 | Defence Desk:
हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक रैली में यह बयान दिया कि भारतीय सेना में लगभग 10% आबादी (उच्च जातियों) का वर्चस्व है, जबकि 90% (ओबीसी, दलित और आदिवासी वर्ग) का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम है। इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में “Indian Army Caste Census” को लेकर बहस छिड़ गई है।

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि क्या भारतीय सेना में कभी जाति आधारित जनगणना हुई है, और आज सेना में भर्ती किस आधार पर की जाती है।

क्या भारतीय सेना में कभी हुई है जाति आधारित जनगणना?

स्वतंत्र भारत में भारतीय सेना (Indian Army) ने कभी भी जाति आधारित जनगणना (Caste-Based Census) नहीं कराई है।
आज के समय में सेना में भर्ती पूरी तरह से योग्यता, शारीरिक क्षमता, मेडिकल फिटनेस और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आधार पर की जाती है।

हालांकि, अगर हम ब्रिटिश औपनिवेशिक काल (British Colonial Period) की बात करें, तो उस दौर में सेना में भर्ती के लिए जाति और समुदाय का बहुत बड़ा प्रभाव था। उस समय अंग्रेजों ने एक नई अवधारणा दी थी — “मार्शल रेस” (Martial Race) — यानी ऐसे समुदाय जो स्वभाव से लड़ाकू और वफादार माने जाते थे।

ब्रिटिश काल में ‘मार्शल रेस’ की अवधारणा

ब्रिटिश राज के दौरान 19वीं सदी के उत्तरार्ध में यह सिद्धांत बनाया गया कि कुछ समुदाय जन्म से ही “योद्धा स्वभाव” के होते हैं।
इन्हें मार्शल रेस कहा गया, और इन्हीं जातियों या समुदायों से सेना में भर्ती को प्राथमिकता दी गई।

इनमें प्रमुख रूप से शामिल थे:

सिख

गोरखा

राजपूत

जाट

पठान

डोगरा

इन समुदायों को “बहादुर, मजबूत और वफादार” माना गया और उनकी अलग-अलग रेजीमेंट्स (Regiments) बनाई गईं।

ब्रिटिश दौर की जनगणना से जुड़ाव

1881 से 1931 के बीच भारत में हुई राष्ट्रीय जनगणनाओं में जाति आधारित आंकड़े शामिल थे।
ब्रिटिश भारतीय सेना (British Indian Army) ने इन आंकड़ों का इस्तेमाल भर्ती पैटर्न तय करने के लिए किया था।
अर्थात, यह सीधी “सेना जनगणना” नहीं थी, लेकिन ब्रिटिश सेना ने जनगणना डेटा के जरिए यह तय किया कि किन जातियों या क्षेत्रों से ज्यादा सैनिक लिए जाएं।

1947 के बाद भारतीय सेना की नई व्यवस्था

1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय सेना (Indian Army) ने जाति आधारित भर्ती प्रणाली को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
इसके स्थान पर लागू हुआ —
“Recruitable Male Population Index” (RMP Index)

इस इंडेक्स के अनुसार, देश के हर राज्य और क्षेत्र से उतनी ही संख्या में भर्ती की जाती है, जितनी वहां की योग्य पुरुष जनसंख्या के अनुपात में हो।
इससे यह सुनिश्चित किया गया कि किसी एक क्षेत्र या समुदाय का अत्यधिक वर्चस्व न हो, और पूरे भारत का संतुलित प्रतिनिधित्व सेना में बना रहे।

आज की भर्ती प्रक्रिया कैसी है?

आज भारतीय सेना की भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह मेरिट और फिटनेस पर आधारित है।
भर्ती के प्रमुख मानक हैं:

शारीरिक फिटनेस (Physical Fitness Test)

मेडिकल परीक्षा

लिखित परीक्षा

योग्यता के अनुसार मेरिट लिस्ट

किसी भी उम्मीदवार से जाति या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता।

जाति आधारित रेजीमेंट्स की ऐतिहासिक विरासत

भले ही आज सेना की भर्ती जाति-निरपेक्ष है, लेकिन कुछ रेजीमेंट्स का गठन ऐतिहासिक रूप से जाति या क्षेत्रीय आधार पर हुआ था — जो आज भी अपनी पहचान और गौरव के साथ कायम हैं।

उदाहरण के लिए:

सिख रेजीमेंट (Sikh Regiment)

राजपूत रेजीमेंट (Rajput Regiment)

महार रेजीमेंट (Mahar Regiment) – जिसकी स्थापना 1941 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के प्रयासों से हुई थी।

मद्रास रेजीमेंट, असम रेजीमेंट और बिहार रेजीमेंट — जो अपने क्षेत्रों से विभिन्न समुदायों के सैनिकों को शामिल करती हैं।

हालांकि, इन सभी रेजीमेंट्स में आज भर्ती समान रूप से सभी योग्य उम्मीदवारों से की जाती है, न कि किसी विशेष जाति या धर्म के आधार पर।

आज की भारतीय सेना “एकता में विविधता” की प्रतीक है।
यहां किसी भी सैनिक की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसकी देशभक्ति, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा से होती है।
ब्रिटिश काल की ‘मार्शल रेस’ नीति अब इतिहास का हिस्सा है, और आधुनिक भारत में सेना की भर्ती पूरी तरह योग्यता और समान अवसरों पर आधारित है।