रूस-यूक्रेन जैसे लंबे युद्ध के लिए तैयार भारत: सेना को 7-10 साल के गोला-बारूद के ऑर्डर का आश्वासन

नई दिल्ली: ऑपरेशन सिंदूर के बाद से रक्षा मामलों पर सक्रियता बढ़ गई है और सरकार-सेना हर स्तर पर युद्ध-तैयारी को लेकर सतर्क दिख रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के लगातार दिए जाने वाले संदेशों और रक्षा खरीद नीतियों में हाल के बदलावों के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि भारतीय सेना अब लंबे टाइम-फ्रेम (multi-year) की लड़ाई के परिदृश्य के लिए भी खड़ी की जा रही है — उसमें रूस-यूक्रेन जैसे सालों तक खिंचने वाले संघर्ष भी शामिल हैं।

एक ऑफ-द रिकॉर्ड थ्री-स्टार जनरल और रक्षा सूत्रों ने एबीपी न्यूज को बताया कि सरकार ने गोला-बारूद (एम्युनिशन) और वॉर-स्टोर्स की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आने वाले 7–10 वर्षों तक लगातार ऑर्डर्स देने का आश्वासन दे दिया है। इसका लक्ष्य यह है कि किसी भी आकस्मिक संघर्ष की स्थिति में भारत की फायर-पावर और लॉजिस्टिक सपोर्ट कम नहीं पड़ें।

कितना स्वदेशी है उत्पादन?

जनरल के अनुसार, आज भारतीय सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले गोला-बारूद का लगभग 90 प्रतिशत से अधिक भारत में ही बनता है। यह एक बड़ा बदलाव है — जहां पहले मुख्य रूप से ऑर्डनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB) पर निर्भरता थी, अब प्राइवेट सेक्टर मजबूत हिस्सेदारी निभा रहा है।

सरकार की मेक-इन-इंडिया नीति और रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी के परिणामस्वरूप आज कम-अधिक 20 के आसपास निजी कंपनियां, जैसे अडानी डिफेंस, भारत-फोर्ज, SMPP और अन्य रक्षा-उद्यम, गोला-बारूद, हथियार और संबन्धित सिस्टम बना रही हैं। इनमें कई कंपनियों ने पूर्व सीडीएस और सेना के आह्वान पर एम्युनिशन-वर्टिकल को प्राथमिकता दी है।

किस तरह का गोला-बारूद बनता है?

भारतीय सेना करीब 175 तरह के अलग-अलग एम्युनिशन का इस्तेमाल करती है—साधारण कैलिबर से लेकर एडवांस प्रिसिजन म्युनिशन तक। इनमें से करीब 134 कैलिबर के एम्युनिशन अब भारत में ही DRDO, PSU और निजी क्षेत्र मिलकर विकसित और मैन्युफैक्चर कर रहे हैं। यह रेंज छोटे हथियारों, तोपखाने, टैंक और एयर-डिफेंस सिस्टम से जुड़ी हुई है।

नई पॉलिसी: प्राइवेट सेक्टर को लेवल-प्लेइंग फील्ड

रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में नया Defence Procurement Manual (DPM-2025) जारी कर के खरीद प्रक्रिया में बड़ा बदलाव किया है। इस मैनुअल के तहत अब सशस्त्र सेनाओं को गोला-बारूद खरीदते समय OFB से अनुमति लेने की बाध्यता नहीं रहेगी, जिससे प्राइवेट कम्पनियों को सीधे खरीद ऑर्डर मिलने में आसानी होगी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बार-बार भरोसा दिलाया है कि निजी उद्योग को सरकारी कंपनियों जैसा लेवल-प्लेइंग फील्ड उपलब्ध कराया जाएगा।

क्यों ज़रूरी है मल्टी-ईयर ऑर्डर?

एक थ्री-स्टार जनरल का कहना है कि गोला-बारूद-संग्रह (war reserves) केवल कपटिकरण नहीं है, बल्कि लॉजिस्टिक्स-रिलायबिलिटी का मुद्दा है। अगर किसी बड़े टकराव या लंबे ऑपरेशन की स्थिति बने तो हर दिन, हर सप्ताह में बड़े पैमाने पर एम्युनिशन की खपत होगी — और ऐसी स्थिति में केवल वर्ल्ड-सप्लायर पर निर्भरता खतरनाक साबित हो सकती है। इसलिए अगले 7-10 साल के लिए नियमित ऑर्डरों की गारंटी से निर्माताओं को निवेश और क्षमता बढ़ाने का भरोसा मिलेगा, जिससे शेल्फ-लाइफ, स्टोरेज और मेंटेनेंस पर भी फोकस रखा जा सकेगा।

शेल्फ-लाइफ और मेंटेनेंस की चुनौती

गोला-बारूद की शेल्फ-लाइफ (shelf life) अहम है। जनरल ने बताया कि नए अनुबंधों में शेल्फ-लाइफ, रिफर्बिशमेंट-प्रावधान और मेंटेनेंस-क्लॉज़ शामिल होंगे। यानी सिर्फ़ बनने पर भरोसा नहीं, बल्कि उनके रखरखाव और समय-समय पर री-टेस्टिंग की जिम्मेदारी भी निर्माता कंपनियों को दी जाएगी। यह सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि जायज़ समय पर पुराने स्टॉक को रिफ्लैश किया जा सके।

भारत की नीति क्या कहती है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा नेतृत्व सार्वजनिक रूप से कहते रहे हैं कि भारत किसी भी स्थिति में युद्ध का पक्षधर नहीं है, पर सुरक्षा-नিরपेक्षता के दौरान त्वरित और निर्णायक क्षमता भी रखेगा। ऑपरेशन सिंदूर जैसे बड़े ऑपरेशनों के बाद यह संदेश और भी स्पष्ट हो गया है: आतंकवाद या हद पार करने वाली किसी भी हरकत का जवाब सशक्त तरीके से दिया जाएगा — और उसके लिए देश को फुर्तीला और तैयार रखना होगा।

विशेषज्ञों की राय और चुनौतियाँ

विशेषज्ञों का कहना है कि यह नीति सही दिशा में कदम है, पर इसके कार्यान्वयन में कुछ चुनौतियाँ हैं: उत्पादन-क्षमता का निर्माण, सप्लाई-चेन की विश्वसनीयता, गुणवत्ता नियंत्रण, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का आधुनिकीकरण और खर्च की पारदर्शिता। साथ ही यह भी जरूरी है कि मल्टी-ईयर ऑर्डर देने से पहले कंटैक्ट मैकेनिज्म स्ट्रांग हों ताकि भविष्य में किसी कंपनी-विशिष्ट निर्भरता से बचा जा सके।

भारत अब केवल छोटे-मोटी आपातकालीन आपूर्ति की सोच से आगे बढ़कर लंबी अवधि की युद्ध-तैयारी कर रहा है। रक्षा मंत्रालय की नीतियों, DPM-2025 और निजी उद्योग की भागीदारी से यह संभावना बढ़ी है कि आने वाले दशक में देश की एम्युनिशन-सेल्फ-रिलायंस मजबूत होगी। फिर भी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार-सेना-उद्योग मिलकर उत्पादन-क्षमता, गुणवत्ता और लॉजिस्टिक्स में स्थायी सुधार कर पाएँ — ताकि जरूरत पड़े तो भारत लंबी लड़ाई की स्थिति में भी निर्णायक बने रह सके।