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		<title>धर्म, कर्म और मृत्यु से भय</title>
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		<dc:creator><![CDATA[आज की आवाज़ टीम]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 18 Dec 2022 10:05:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कहा जाता है की इस दुनिया में मनुष्य को सबसे ज्यादा डर मरने से लगता है। लेकिन क्या सच में ऐसा है? जब विनोबा जी को कैंसर की बिमारी के बारे में पता चला तो उन्हें आपरेशन की सलाह दी गई। वर्ना तीन माह में मृत्यु की घोषणा कर दी गई। विनोबा जी ने आपरेशन कराने से मना कर दिया। साथ ही एलोपैथिक दवा खाने से भी मना कर दिया। बिना किसी चिकित्सा के प्रकृति के सान्निध्य में भक्त्ति-भाव से उन्होंने गांधी जी के बताए रास्ते से एक सर्वोदयी मार्गदर्शन का जीवन 14 वर्षों तक जीया और उनकी मृत्यु कैंसर के कारण नहीं स्वेच्छा से अन्न-जल-सांस की क्रिया त्याग देने से समाधि के दौरान हुई। फिल्म आनंद के नायक की तरह विनोबा जी की वास्तविक कथा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि भारतीय मध्यवर्ग अपनी छद्म आधुनिकता के दबाव में मृत्यु को एक संगीत की तरह जिंदगी पर धीरे-धीरे छाने का मौका क्यों नहीं देता? वह इलाज के बहाने मृत्यु की प्रक्रिया दुखद, खर्चीली, अनिश्चित और तीव्र क्यों बना देता है? हममें विनोबा भावे और इच्छा क्यों नहीं होती। इसका एक कारण नास्किता या कमजोर अस्तिकता है। जब हम ईश्वर के अस्तित्व पर शंका करके मानवीय जीवन और &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"><img fetchpriority="high" decoding="async" class=" alignleft size-full wp-image-547" style="margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; float: left;" src="http://aajkiawaaz.com/newaaj/wp-content/uploads/2013/04/vastu_meditation-3.gif" alt="vastu meditation-3" width="344" height="480" />कहा जाता है की इस दुनिया में मनुष्य को सबसे ज्यादा डर मरने से लगता है। लेकिन क्या सच में ऐसा है? जब विनोबा जी को कैंसर की बिमारी के बारे में पता चला तो उन्हें आपरेशन की सलाह दी गई। वर्ना तीन माह में मृत्यु की घोषणा कर दी गई। विनोबा जी ने आपरेशन कराने से मना कर दिया। साथ ही एलोपैथिक दवा खाने से भी मना कर दिया। बिना किसी चिकित्सा के प्रकृति के सान्निध्य में भक्त्ति-भाव से उन्होंने गांधी जी के बताए रास्ते से एक सर्वोदयी मार्गदर्शन का जीवन 14 वर्षों तक जीया और उनकी मृत्यु कैंसर के कारण नहीं स्वेच्छा से अन्न-जल-सांस की क्रिया त्याग देने से समाधि के दौरान हुई। फिल्म आनंद के नायक की तरह विनोबा जी की वास्तविक कथा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि भारतीय मध्यवर्ग अपनी छद्म आधुनिकता के दबाव में मृत्यु को एक संगीत की तरह जिंदगी पर धीरे-धीरे छाने का मौका क्यों नहीं देता? वह इलाज के बहाने मृत्यु की प्रक्रिया दुखद, खर्चीली, अनिश्चित और तीव्र क्यों बना देता है? हममें विनोबा भावे और इच्छा क्यों नहीं होती। इसका एक कारण <span id="more-548"></span> नास्किता या कमजोर अस्तिकता है। जब हम ईश्वर के अस्तित्व पर शंका करके मानवीय जीवन और मृत्यु को एक घटना भर मान लेते हैं तो जीवन का कोई दैविक अर्थ नहीं रह जाता।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">कर्म के सिद्धांत और पुर्नजन्म के सिद्धांत पर हमारा विश्वास नहीं रह जाता और हम जिंन्दगी से जोंक की तरह किसी भी कुत्रित तरीके से चिपके रहना चाहते हैं। भविष्य हमारे सामने एक साये में हम जिंदगी का आनंद उत्सव की तरह नहीं मना पाते। कल क्या होगा? एक आतंक की तरह हमारी चेतना पर हावी रहता है और हम भगवान बुद्ध की वाणी पर अनास्था करने लगते हैं। जिंन्दगी का रस कतरा-कतरा रिसते रहात है और खुशी के इन रसीले क्षणों के आनंद से हम भविष्य के आशंकित आतंक के डर के कारण वंचित रह जाते हैं। वर्ना जिंदगी और मौत एक प्राकृतिक कविता है, एक दैवीय छंद है, लीलात्मक गीता है, इसे खेल भाव से लेना चाहिए। इसे जीने के लिए आस्था, विश्वास, भक्ति और कर्म के भारतीय सिद्धांत में यकीन चाहिए।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">इसके लिए नास्तिक आधुनिकता के स्तंभों की बैशाखी नहीं काम आती। मौत का कोई इलसज नहीं हैं आत्मा के भीतर सत्यम् शिवम् सुन्दरम् है। असीम, शाश्वत सम्पूर्ण मौन हैं इसकी आत्मानुभूति में डूब कर ही जिंन्दगी और मौत के बीच की झीनी चदरिया को देखा जा सकता है। बिना इसकी अनुभूमि के ब्राह्माण्ड और ब्रह्म की अनुभूति नहीं हो सकती। शरीर की जिंदगी और मौत दोनों झणभंगुर हैं। आत्मा अजर-अमर है। वह 84 लाख योनियों भटका करती है। योनियां शरीर की जाति है, कोटि हैं, रूप हैं। आत्मा बिना शरीर के प्रेत बन जाती है। सच तो यह है कि प्रेत का भी एक सूक्ष्म ’करण शरीर’ होता है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">सनातन धर्म में आत्मा शरीरहीन नहीं होती। उसे भूत-प्रेत कहा जाता है। भूत यानि बीता हुआ रीता हुआ। एक शरीर के नष्ट होने के बाद भी उसकी स्मृति में मोहासक्त्त आत्मा प्रेत कहलाती है। इसी प्रेत से मुक्त्ति के लिए हिन्दुओं ने अग्निी संस्कार का निर्माण किया है। इसकी सनातनी अवधि तरह दिनों की है। आर्य समाजी इसे तीन दिनों में ही पूरा कर लेने का दावा करते हैं। मुसलमानों, ईसाईयों और यहूदियों में इस आत्मा की भूतपूर्व शरीर से मोहाशक्त्ति को मुक्त्त करने के लिए अतिरिक्त्त प्रयास या धार्मिक संस्कार नहीं किया जाता। मुक्त्ति के लिए अग्नि संस्कार का विधान है। अग्नि मुक्त्त करती है। सेमेटिक धर्मों में कयामत के दिन कर्मानुसार उनकी मुक्त्ति या बंधन का निर्णय खुदा करता है। मुक्त्ति की बात मूलतः ईसाईयत में है। यहूदियों और मुसलमानों में प्रेतात्मा को जन्नत या नरक मिलता है। वह सनातनी अर्थों में कभी मुक्त्त नहीं होतीं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">सेमेटिक धर्म से निकली परम्पराओं में केवल ईसा मसीह और काल्विन के यहां मुक्त्ति या सालवेशन की अवधारणा है। लेकिन वहां भी मुक्त्त या सालवेशन की अवधारणा है। लेकिन वहां भी मुक्त्त आत्माएं स्वर्ग में रहती हैं। काल्विन के यहां तो मुक्त्त होने का प्रमाण ही यही है कि वे ’पूंजीवादी स्वर्ग’ में सफल हो जाते हैं। बिना ईश्वरीय कुपा के सफलता संभव नहीं है। इस सफलता में कर्म की भूमिका होती है। इस तरह काल्विल का प्रोटेस्टंट सम्प्रदाय यहूदी और इस्लाम के बीच की चीज है। वह ईसा मसीह की मूल शिक्षा के गुणात्मक रूप से मिली है जिसमें एक सुई के भीतर के छेद से हाथी तो पार हो सकता है लेकिल एक पूंजीपति स्वर्ग में प्रवेश के लिए ईसा मसीह की कृपा जरूरी है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">ईसा की शहादत से ईसाई परम्परा में अतिरिक्त्त (सरप्लस) पुण्य का संचय हुआ था। उसी सरप्लस पुण्य की कुपा या सहयोग से एक समर्पित ईसाई स्वर्ग में मुक्त्त हो सकता है। लेकिन उस मुक्त्ति में आत्मा का शरीर किस तरह का होता है इस पर ईसाई धार्माचार्यों के बीच असहमतियां या विवाद हैं। सनातन धर्म में असहमति नहीं है। मुक्त्त आत्मा दूसरा शरीर धारण करती है या फिर ब्रह्म में विलीन हो जाती है। पहली मुक्त्ति को पुनर्जन्म कहते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">दूसरी को निर्वाण या कैवल्य कहते हैं। जब तक आत्मा की इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं वह जन्म -मृत्यु के चक्र से मुक्त्त नहीं होती। वह अपना शरीर बदलते रहती है। मुक्त्ति के परम रूप के लिए संतृप्त और परम संतुष्ट होना जरूरी है। इसका रास्ता मूलतः प्रेम या भक्त्ति है। प्रेम आत्मा को ध्यानस्थ बना देता है। ण्यान से प्रेम और प्रेम से ध्यान पैदा होता है। ध्यान और प्रेम से एकाग्रता और मौन का जन्म होता है। मौन में शांति है। शांति में सत्यम् शिवम् सुन्दरम् की अनुभूति होती है। अतः मौत का खौफ नहीं होता। मौत का खौफ अज्ञानी को ही होता है। आधुनिक नास्तिकता के मूल में मौत का खौफ और स्वर्ग की लालसा है। सनातन धर्म के मूल में जीवन का उत्सव और मुत्यु की मौन संगीत है। अकारण सतत आनंद की अनुभूति है। करूणा का जल-प्राप्त है। प्रेम और ध्यान के जोड़ या मेल से करूणा का जन्म होता है। ध्यान अपने सच्चे स्वरूप् के प्रति सजग करने का एक परीक्षित उपाय है, वह स्वरूप जिसके साथ तुम अपने शरीर में जन्में हो।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">एक बार मनुष्य अपने सच्चे स्वरूप को जान ले तो फिर उसे मौत का खौफ नहीं होता, किसी प्रकार की दहशत नहीं होती, भविष्य की चिंता नहीं होती, व्यर्थ की भाग -दौड़, होड़, प्रतियोगिता, महत्वकांक्षा नहीं रह जाती। एक अजीब सकून प्राप्त होता है। अजीब निश्चिन्तिता आ जाती है और व्यक्ति वह करने लगता है। वह सुजानात्मक हो जाता है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">व्ह हर वासना से मुक्त्त होकर अपने स्वकर्म में रत हो जाता है। उसे कोई कमी महसूस नहीं होती। वह अपने आप में पूर्ण हो जाता है। जिंदगी की संतृप्त मस्ती से भर जाता है। आनंद की सीमा नहीं रहती। वह आत्म-मुग्ध नहीं आत्म-निष्ठ, अपने स्व और प्रिय ब्रह्म के प्रति उन्नमुख, क्रियाशील लेकिन परम संतुयट हो जाता है। इसे ही सनातन धर्म में ध्यान या पुरूषार्थ कहता है। मृत्यु में स्वाभाविक रूप से प्रवेश करना सनातन धर्म में ध्यान या पुरूषार्थ की स्थापित रीति है। जब भी कोई व्यक्ति बुद्ध से दीक्षा लेता तो बुद्ध उसको तीन महीने तक किसी शमशान में जाकर किसी जलते हुए शरीर को, जलती हुई लाश को देखने के लिए कहते थे। बुद्ध कहते कि भयभीत व्यक्ति धर्म में प्रवेश नहीं कर सकता। मृत्यु ही एकमात्र निश्चित घटना है। जीवन में मृत्यु के सिवाय और कुछ भी निश्चित नहीं है। बाकी सब कुछ सांयोगिक है। केवल मृत्यु सांयोगिक नहीं है। केवल मृत्यु ही दुर्घटना नहीं है, बाकी सब घटनावश है। मृत्यु पूर्णतः निश्चित है। तुम्हें मरना ही है तो निर्विकार भाव से, आनंदपूर्वक मृत्यु में प्रवेश करों। क्योंकि मृत्यु से भय का मतलब है अपनी जिंदगी से भय।</span></p>
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		<title>जानिए सिर पर तिलक का महत्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[आज की आवाज़ टीम]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 19 Oct 2017 10:14:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
		<category><![CDATA[importance of Tilak]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Culture]]></category>
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		<category><![CDATA[Worship and devotion]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>हमारी भारतीय संस्कृति में पूजा और भक्ति का एक प्रमुख अंग तिलक को मन गया है। हमारी संस्कृति में पूजा-अर्चना, संस्कार विधि, मंगल कार्य, यात्रा गमन, शुभ कार्यों के प्रारंभ में माथे पर तिलक लगाकर उसे अक्षत से विभूषित किया जाता है। भारत में आज भी तिलक का बहुत महत्व है यहाँ तिलक-आरती के साथ आदर सत्कार-स्वागत कर तिलक लगाया जाता है। तिलक मस्तक पर दोनों भौंहों के बीच नासिका के ऊपर प्रारंभिक स्थल पर लगाए जाते हैं जो हमारे चिंतन-मनन का स्थान है- यह चेतन-अवचेतन अवस्था में भी जागृत एवं सक्रिय रहता है, इसे आज्ञा-चक्र भी कहते हैं। इसी चक्र के एक ओर दाईं ओर अजिमा नाड़ी होती है तथा दूसरी ओर वर्णा नाड़ी है। इन दोनों के संगम बिंदु पर स्थित चक्र को निर्मल, विवेकशील, ऊर्जावान, जागृत रखने के साथ ही तनावमुक्त रहने हेतु ही तिलक लगाया जाता है। इस बिंदु पर यदि सौभाग्यसूचक द्रव्य जैसे चंदन, केशर, कुमकुम आदि का तिलक लगाने से सात्विक एवं तेजपूर्ण होकर आत्मविश्वास में अभूतपूर्ण वृद्धि होती है, मन में निर्मलता, शांति एवं संयम में वृद्धि होती है। पूजा और भक्ति का एक प्रमुख अंग तिलक है। भारतीय संस्कृति में पूजा-अर्चना, मंगल कार्य, यात्रा गमन, शुभ कार्यों के प्रारंभ में माथे पर &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>हमारी भारतीय संस्कृति में पूजा और भक्ति का एक प्रमुख अंग तिलक को मन गया है। हमारी संस्कृति में पूजा-अर्चना, संस्कार विधि, मंगल कार्य, यात्रा गमन, शुभ कार्यों के प्रारंभ में माथे पर तिलक लगाकर उसे अक्षत से विभूषित किया जाता है।</p>
<p>भारत में आज भी तिलक का बहुत महत्व है यहाँ तिलक-आरती के साथ आदर सत्कार-स्वागत कर तिलक लगाया जाता है। तिलक मस्तक पर दोनों भौंहों के बीच नासिका के ऊपर प्रारंभिक स्थल पर लगाए जाते हैं जो हमारे चिंतन-मनन का स्थान है- यह चेतन-अवचेतन अवस्था में भी जागृत एवं सक्रिय रहता है, इसे आज्ञा-चक्र भी कहते हैं। इसी चक्र के एक ओर दाईं ओर अजिमा नाड़ी होती है तथा दूसरी ओर वर्णा नाड़ी है।</p>
<p>इन दोनों के संगम बिंदु पर स्थित चक्र को निर्मल, विवेकशील, ऊर्जावान, जागृत रखने के साथ ही तनावमुक्त रहने हेतु ही तिलक लगाया जाता है। इस बिंदु पर यदि सौभाग्यसूचक द्रव्य जैसे चंदन, केशर, कुमकुम आदि का तिलक लगाने से सात्विक एवं तेजपूर्ण होकर आत्मविश्वास में अभूतपूर्ण वृद्धि होती है, मन में निर्मलता, शांति एवं संयम में वृद्धि होती है। पूजा और भक्ति का एक प्रमुख अंग तिलक है।</p>
<p>भारतीय संस्कृति में पूजा-अर्चना, मंगल कार्य, यात्रा गमन, शुभ कार्यों के प्रारंभ में माथे पर तिलक लगाकर उसे अक्षत से विभूषित किया जाता है। उत्तर भारत में आज भी तिलक-आरती के साथ आदर सत्कार तिलक लगाया जाता है।</p>
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