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	<title>Nagar Panchayat Archives - www.aajkiawaaz.com</title>
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		<title>सालों से अदालत की नज़रों में फरार आरोपी बना मुख्य पार्षद</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Pankaj Ranjit]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 25 Oct 2014 18:32:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[बिहार और झारखण्ड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>सालों से अदालत की नज़रों में फरार आरोपी अब विराजमान है किसी नगर निगम के चेयर पर,उस पर तुर्रा यह कि जैसे उसे अपने जुर्म का ईल्म ही न हो। ख़ास और चौंकाने वाली बात यह है कि पुलिसिया अनुसंधान में अपराध और आरोपी की पुष्टि उपरान्त न्यायालय के द्वारा संज्ञान लेने के वावजूद भी उक्त दबंग आरोपी कैसे बच गया,यह किसी को मालूम नहीं। जबकि न्यायलय द्वारा उसके उपर गैर-जमानती वारंट भी निर्गत हो चुके थे ,फिर भी लगभग पंद्रह वर्षों तक यह मामला आखिर पुलिस फाइलों में ऐसे दब कर रह गई जो किसी को भी पता नहीं हो पाया, और एक दिन इतने बड़े संगीन अपराध के आरोपी बन जाते हैं किसी नगर पंचायत के मुख्य पार्षद। जब पत्रकारों और मीडिया ने मामले का पर्दा फाँश किया तो आरोपी मीडिया के कैमरे से बचने के लिए, पहले ही अपने कार्यालय छोड़ कर भाग पाये गए। हांलाकि सुपौल पुलिस आरक्षी अधीक्षक पंकज कुमार राज ने अपनी जुबान से अपने विभाग की गलती को सही पाते हुए तुरंत कार्रवाई के आदेश तो दे दिए। मगर सीधा सवाल है&#8230;&#8230;&#8230; क्या एक गैर-जमानती वारंट वाला आरोपी जिस पर लगभग पन्द्रह वर्षों से न्यायालय में कोई गंभीर मामला लंबित हो और वह &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>सालों से अदालत की नज़रों में फरार आरोपी अब विराजमान है किसी नगर निगम के चेयर पर,उस पर तुर्रा यह कि जैसे उसे अपने जुर्म का ईल्म ही न हो। ख़ास और चौंकाने वाली बात यह है कि पुलिसिया अनुसंधान में अपराध और आरोपी की पुष्टि उपरान्त न्यायालय के द्वारा संज्ञान लेने के वावजूद भी उक्त दबंग आरोपी कैसे बच गया,यह किसी को मालूम नहीं। जबकि न्यायलय द्वारा उसके उपर गैर-जमानती वारंट भी निर्गत हो चुके थे ,फिर भी लगभग पंद्रह वर्षों तक यह मामला  आखिर पुलिस फाइलों में ऐसे दब कर रह गई जो  किसी  को भी पता  नहीं हो पाया, और एक दिन  इतने बड़े संगीन अपराध के आरोपी बन जाते हैं किसी नगर पंचायत के मुख्य पार्षद। जब पत्रकारों और मीडिया ने मामले का पर्दा फाँश किया तो आरोपी मीडिया के कैमरे से बचने के लिए, पहले ही अपने कार्यालय छोड़ कर भाग पाये गए। </p>
<p>हांलाकि सुपौल पुलिस आरक्षी अधीक्षक पंकज कुमार राज  ने अपनी जुबान से अपने विभाग की गलती को सही पाते हुए तुरंत कार्रवाई के आदेश तो दे दिए। मगर सीधा सवाल है&#8230;&#8230;&#8230; क्या एक गैर-जमानती वारंट वाला आरोपी जिस पर लगभग पन्द्रह वर्षों से न्यायालय में कोई  गंभीर मामला लंबित हो और वह उतनी ही अवधि से पुलिस फाईल में फरार घोषित भी हो,किसी भी चुनाव को लड़ सकता है ?  अगर लड़ कर चुनाव जीत जाये, तो जरा सोचिये कि उसका क्या होगा जो एक अच्छी क्षवि के प्रत्यासी इनकी वजह से किसी चेयरमैन जैसे पद पर आसीन होने से वंचित रह जातें हैं। संदर्भित मामला ठीक उसी प्रकार का है।    </p>
<p>वर्षो पहले फारबिसगंज के एक व्यापारी से रुपया छिनतई के मामले में बीरपुर थाना कांड संख्यां:-29/99 के रूप में जो मामला दर्ज हुआ था उसके अंतर्गत &#8221;जय माँ लक्ष्मी वस्त्रालय&#8221; फारबिसगंज का एक व्यवसायी रमेश चौधरी पिता रघुवीर चौधरी 18 मार्च 1999 समय संध्या 05 बजे बीरपुर से तगादा वसूली के क्रम में Rs.59,500/-रूपये लेकर सूमो गाड़ी से वापस फारबिसगंज की ओर आ रहा था,कि अचानक वह गाड़ी कहीं रास्ते में रुकवा कर शौचालय जाने के लिए उतरने लगा तभी दो अनजाने लोगों ने उसे घेर कर उसके पास से Rs.59,500/-रूपये की थैली छीन भागे। इस घटना को लेकर वादी रमेश चौधरी ने घटना स्थल के सुपौल जिला अवस्थित बीरपुर में  दो अज्ञात लोगों पर FIR दर्ज किया जो बीरपुर थाना कांड संख्यां:- 29/99 के रूप में दर्ज हुआ। </p>
<p>समय के अनुसार केस अनुशंधान में अनुशंधानकर्ता सब इंस्पेक्टर शैलेन्द्र के द्वारा इस मामले की पुष्टि में  कुल दो अपराधियों की शिनाख्ती भी हो गयी जिनमे से भीमनगर का एक आरोपी संजय सिंह  ने अपनी ग्रिफ्तारी दी बांकी दूसरा आरोपी बीरपुर निवासी  गोपाल आचार्य पिता उमेश आचार्य फरार हो गया। </p>
<p>उक्त मामले में बीरपुर अनुमंडल न्यायालय ने भी जब-जब इस मामले में GR-131/99 के रूप में पुलिस से संज्ञान लिया तो प्रत्येक वारंट में पुलिस ने  आरोपी गोपाल आचार्य पिता उमेश आचार्य को हर बार फरार ही पाया बताया गया। समय भी ऐसे बीतता गया जैसे माना जाय तो लगता है , आरोपी का मक़सद भी समय को बिताना एक गहरी साजिश मालूम सी दिखने सी लगने लगी,जिसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आरोपी धीरे-धीरे अपने ऊपर से पुलिस और न्यायालय का ध्यान हटाते हुए बड़े मजे से अपनी राजनितिक पहुंच और रसूख की वजह से बीरपुर नगर पंचायत का चुनाव दो बार लगातार लड़ा जिसमे वह पहली बार शिकस्त खाने के दूसरी बार में अपनी दूर दृष्टि की चाल में न सिर्फ सफलता पायी बल्कि एक मामूली पार्षद से मुख्य पार्षद भी  बन गया। </p>
<p>सबसे ताज्जुब की बात तो यह है कि दो मर्तवा चुनाव लड़ने के लिए जिला निर्वाचन विभाग द्वारा मांगे गए सही जानकारी देने वाले कॉलम में आरोपी गोपाल आचार्य ने अपने नामांकन सम्बन्धी जानकारियों के अंतर्गत  दोनों ही बार,अपने ऊपर चल रहे बीरपुर थाना कांड संख्यां:-29/99 के इस मामले जैसे तथ्यों को छुपा लिया तथा  उन्होंने अपने शपथ पत्र में भी गलत जानकारी देकर जिला निर्वाचन विभाग को भी दिग्भ्रमित कर दिया। मगर सवाल  है कि क्या गोपाल आचार्य द्वारा दी गयी जानकारियां जितनी भी थी, क्या&#8230;&#8230;&#8230;..  सुपौल जिला निर्वाचन विभाग कार्यालय ने इसकी सही तरीके से जांच की ?अगर जाँच सही भी हो, तो क्या उन्होंने पुलिस विभाग के द्वारा निर्गत प्रस्तुत चरित्र प्रमाण-पत्र पर अपनी निगाह डाली? अगर पुलिस विभाग ने गोपाल आचार्य पर किसी भी प्रकार के आपराधिक मामले नहीं होने का प्रमाण-पत्र निर्गत करता है, तब यह मामला और भी गंभीर जो जायेगा। </p>
<p>इन तमाम बातों और सवालों के मद्देनज़र सर्व-प्रथम इसकी सूक्षमता से जाँच होनी चाहिए और तब इसके आलोक में पुलिसिया कार्रवाई क्या होगी यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा कि अपराध और अपराधी के के पीछे दोषी और कितने हैं. फिर भी मीडिया के कैमरे में वयान के तौर पर सुपौल जिला पुलिस कप्तान पंकज कुमार राज  ने यह स्पष्ट रूप से यह स्वीकारा है कि यह मामला उनके संज्ञान में नहीं था ,मगर कहीं न कहीं यह लंबित मामला किसी न किसी भूल की एक वजह होगी जिसे वह खुद अपने स्तर से देखते हुए विधि-सम्मत कार्रवाई करेंगे।</p>
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