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		<title>भींगे सिर सरकारी तेल..</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Tarkesh Kumar Ojha]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 25 Nov 2015 13:26:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[सम्पादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[क़ारोबार]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>मैं कॉमर्स का छात्र होने के बावजूद शेयर मार्केट का उतार – चढ़ाव कभी अपने पल्ले नहीं पड़ा। सेंसेक्स में एक उछाल से कैसे किसी कारोबारी को लाखों का फायदा हो सकता है, वहीं गिरावट से नुकसान , यह बात समझ में नहीं आती। अर्थ – व्यवस्था की यह पेचीदगी राजनीति में भी देखने को मिलती है। मसलन जब कोई राजनैतिक दल विपक्ष में होता है तो बार – बार बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी को रोना रोता है, लेकिन सत्ता मिलते ही वहीं यह कह कर हाथ भी खड़े कर देता है कि गरीबी व बेरोजगारी दूर करने की कोई जादू की छड़ी उसके पास नहीं है। यह जब दूर होना होगा, तब होगा। इसमें वे कुछ नहीं कर सकते। सरकारी आयोजनों में एक ही मंच से विकास के दावे और खस्ताहाल आर्थिक स्थिति का रोना सुनना अजीब लगता है। राज्यों के मंत्री व मुख्यमंत्री करोड़ों की योजनाओं की घोषणा करते हुए कहेंगे कि उनके कार्यकाल में किस तरह विकास की गंगा बह निकली है। लेकिन साथ ही बदहाली की शिकायत करते हुए केंद्र को कोसने से भी नहीं चूकेंगे। खास तौर से विरोधी दलों के मुख्यमंत्री अक्सर केंद्र पर पक्षपात और असहयोग का आरोप लगाते हुए कहते सुने जाते &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">मैं कॉमर्स का छात्र होने के बावजूद शेयर मार्केट का उतार – चढ़ाव कभी अपने पल्ले नहीं पड़ा। सेंसेक्स में एक उछाल से कैसे किसी कारोबारी को लाखों का फायदा हो सकता है, वहीं गिरावट से नुकसान , यह बात समझ में नहीं आती। अर्थ – व्यवस्था की यह पेचीदगी राजनीति में भी देखने को मिलती है। मसलन जब कोई राजनैतिक दल विपक्ष में होता है तो बार – बार बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी को रोना रोता है, लेकिन सत्ता मिलते ही वहीं यह कह कर हाथ भी खड़े कर देता है कि गरीबी व बेरोजगारी दूर करने की कोई जादू की छड़ी उसके पास नहीं है। यह जब दूर होना होगा, तब होगा। इसमें वे कुछ नहीं कर सकते।</p>
<p style="text-align: justify;">सरकारी आयोजनों में एक ही मंच से विकास के दावे और खस्ताहाल आर्थिक स्थिति का रोना सुनना अजीब लगता है। राज्यों के मंत्री व मुख्यमंत्री करोड़ों की योजनाओं की घोषणा करते हुए कहेंगे कि उनके कार्यकाल में किस तरह विकास की गंगा बह निकली है। लेकिन साथ ही बदहाली की शिकायत करते हुए केंद्र को कोसने से भी नहीं चूकेंगे। खास तौर से विरोधी दलों के मुख्यमंत्री अक्सर केंद्र पर पक्षपात और असहयोग का आरोप लगाते हुए कहते सुने जाते हैं कि हम तो प्रदेश में कब का रामराज्य ला चुके होते, लेकिन केंद्र सहयोग ही नहीं कर रहा। उन्हें उनका पैकेज नहीं दिया जा रहा। उलटे कर्ज के एवज में मोटी रकम ब्याज के तौर पर वसूली जा रही है&#8230; वगैरह – वगैरह।</p>
<p style="text-align: justify;">केंद्र का हाल तो और भी अजीब है। बिल्कुल उन धनी – मानी लोगों की तरह जिनकी समृद्धि के चर्चे गली – कुचों में सुने जाते हैं। लेकिन मुलाकात पर वही कारोबार में हो रहे कथित घाटे और खस्ताहाल माली हालत का रोना लेकर बैठ जाते हैं और सामने वाले को पकाते रहते हैं। ऐसी मुलाकातों में अक्सर सामने वाले को लगता है &#8230; यार मैं कहां फंस गया&#8230; सोचा था इसके लिए कुछ दान लूंगा लेकिन यहां तो उलटे देने की नौबत न आ जाए। लेकिन फिर कभी उसी के बारे में भारी निवेश और धन – संपति खरीदने की खबरें भी सुनने को मिलती है। अपनी सरकारों का रवैया भी कुछ ऐसा ही अबूझ और रहस्यमय है।</p>
<p style="text-align: justify;">अभी हाल में ही तो मंदी और घाटे की अर्थ – व्यवस्था की दलीलें सुन – सुन कर लोग बोर हो रहे थे। तमाम मंत्री कहते सुने जाते थे कि सरकार तो जनता के लिए फलां – फलां काम करना चाहती थी, लेकिन क्या करें, फंड ही नहीं है। हमें खस्ताहाल अर्थ – व्यवस्था मिली है। खुशहाली के लिए जनता को अभी इंतजार करना पड़ेगा&#8230; अर्थ &#8211; व्यवस्था के पटरी पर आने में वक्त लगेगा। आप को कम से कम इतने साल तो इंतजार करना ही पड़ेगा। लेकिन अब बाबुओं के मामले में सरकार की अकल्पनीय दरियादिली देखने को मिल रही है। यानि सरकार ने भींगे सिर वालों के बालों में और तेल चुपड़ने की पूरी व्यवस्था कर दी है। मोटी तनख्वाह पाने वाले बाबुओं की जेबें अब और भारी होंगी। केवल अर्थ के मामले में ही नहीं, सुख – सुविधाओं के मामले में भी । इस वर्ग को मिलने वाली अनगिनत छुट्टियों पर लोग पहले ही नाक – भौं सिकोड़ते रहते थे। लेकिन अब सरकार बाबुओं को मातृत्व और पितृत्व के एवज में लंबा अवकाश भी देने जा रही है। हो सकता है कि कुछ दिन बाद ऐसी घोषणा भी हो जाए कि काम पर न आने वाले बाबुओं को भी उतना ही वेतन मिलेगा जितना काम पर आने वालों को मिलता है। लेकिन सरकार की इस घोषणा से असंगठित क्षेत्</p>
<p style="text-align: justify;">र के श्रमिक व कर्मचारी महंगाई औऱ अमीरी – गरीबी के बीच की खाई के और चौड़ी होने की आशंका व्यक्त करते हुए न जाने कैसी – कैसी अपशकुनी बातें कह रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">कहा जा रहा है कि चंद हजार में 12 – 12 घंटे और चंद घंटों में लाखों की पगार से देश का माहौल बिगड़ेगा। आखिर सरकार उन बालों में और तेल कैसे डाल सकती है जो पहले ही तेल से लबालब भींगे हुए है।जबकि सरकार की दलील है कि इससे देश के खजाने पर कुछ बोझ तो जरूर बढ़ेगा, लेकिन वह इतना ज्यादा भी नहीं होगा कि गाड़ी चलनी मुश्किल हो जाए। उलटे अर्थ – व्यवस्था को लाभ ही होगा। आप पूछेंगे कैसे तो सुनिए। बाबुओं की तनख्वाह और सुख – सुविधाएं बढ़ेगी तो कार, फ्लैट आदि की मांग में खासी वृद्धि होगी। बाबु खुले दिल से खर्चा करेंगे तो यह धन आखिर भुक्खड़ों के बीच ही तो बंटेगा&#8230;। इसलिए मैं तो कहूंगा सरकार की मंशा पर शक करना पाप से कम नहीं&#8230;।</p>
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		<title>भारत में राजनीति और भ्रष्टाचार</title>
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		<dc:creator><![CDATA[आज की आवाज़ टीम]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 16 Dec 2013 10:02:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[British rule and corruption]]></category>
		<category><![CDATA[corruption]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial news]]></category>
		<category><![CDATA[History of corruption]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>राजनीति एक सम्पूर्ण व्यवस्था कहलाती हैं, जिसका मूल उदेश्ये लोकहित होता हैं और जिसकी सफलता जनता की खुशहाली पर निर्भर करती हैं। राजनीति में जनता एक सेवक का चुनाव करती है ऐसा सेवक जिसे नेता कहा जाता है, जो जनता की हर समस्या से परिचित हो, उसके और जनता के मध्य कोई राज न हो। पारदर्शिता इस व्यवस्था का एक मूल अंग होता हैं। जब शासक अपने सहयोगियों के हर कार्य और राज से परिचित होता हैं तो वो सफल रहता हैं। लेकिन यह सभी बाते सिर्फ परिभाषित करने मात्र ही हैं, जिसका आज हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। आज किसी भी नेता के लिए राजनीति का मतलब चुनाव जीत कर सत्ता की कुर्सी तक पहुँचाना हैं और फिर 5 सालों तक जितना हो सके जनता के पैसे से अपना हित करना हैं। आज के नेता सेवक नहीं शक्ति में मदहोश अकुशल राजा बन गए हैं, जो अपना कर्तव्य भूल चुके हैं।&#160; आज चरों तरफ सिर्फ मतलबी राजनीति है। राजनीति, कहीं वोट की तो कही नोट की, कहीं जाति की तो कहीं धर्म की, कहीं क्षेत्र की तो कहीं देश की, कही प्यार में राजनीति तो कही नफरत में राजनीति, कहीं दोस्ती में राजनीति तो कहीं दुश्मनी में राजनीति, &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"><img fetchpriority="high" decoding="async" class=" alignleft size-full wp-image-653" src="http://aajkiawaaz.com/newaaj/wp-content/uploads/2013/12/india.jpg" alt="india" style="margin-right: 10px; margin-bottom: 10px; float: left;" height="360" width="360" srcset="http://www.aajkiawaaz.com/wp-content/uploads/2013/12/india.jpg 360w, http://www.aajkiawaaz.com/wp-content/uploads/2013/12/india-200x200.jpg 200w, http://www.aajkiawaaz.com/wp-content/uploads/2013/12/india-300x300.jpg 300w, http://www.aajkiawaaz.com/wp-content/uploads/2013/12/india-150x150.jpg 150w, http://www.aajkiawaaz.com/wp-content/uploads/2013/12/india-90x90.jpg 90w" sizes="(max-width: 360px) 100vw, 360px" />राजनीति एक सम्पूर्ण व्यवस्था कहलाती हैं, जिसका मूल उदेश्ये लोकहित होता हैं और जिसकी सफलता जनता की खुशहाली पर निर्भर करती हैं। राजनीति में जनता एक सेवक का चुनाव करती है ऐसा सेवक जिसे नेता कहा जाता है, जो जनता की हर समस्या से परिचित हो, उसके और जनता के मध्य कोई राज न हो। पारदर्शिता इस व्यवस्था का एक मूल अंग होता हैं। जब शासक अपने सहयोगियों के हर कार्य और राज से परिचित होता हैं तो वो सफल रहता हैं।</span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">लेकिन यह सभी बाते सिर्फ परिभाषित करने मात्र ही हैं, जिसका आज हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। आज किसी भी नेता के लिए राजनीति का मतलब</span></p>
<p>  <span id="more-654"></span>  </p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">चुनाव जीत कर सत्ता की कुर्सी तक पहुँचाना हैं और फिर 5 सालों तक जितना हो सके जनता के पैसे से अपना हित करना हैं। आज के नेता सेवक नहीं शक्ति में मदहोश अकुशल राजा बन गए हैं, जो अपना कर्तव्य भूल चुके हैं।</span>&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">आज चरों तरफ सिर्फ मतलबी राजनीति है। राजनीति, कहीं वोट की तो कही नोट की, कहीं जाति की तो कहीं धर्म की, कहीं क्षेत्र की तो कहीं देश की, कही प्यार में राजनीति तो कही नफरत में राजनीति, कहीं दोस्ती में राजनीति तो कहीं दुश्मनी में राजनीति, कहीं गाँव की तो कहीं शहर की, कहीं अपनो की तो कहीं परायों की, पर कहीं न कहीं राजनीति तो हो रही है। कहने का तात्पर्य, राजनीति शब्द का क्षेत्र जितना व्यापक है उतना ही संकुचित भी। तभी तो एक बाप अपने बेटे से निःसंकोच यह कहता है, बेटा, अपने बाप से ही राजनीति कर रहे हो? प्रदेश हो या देश, गाँव हो या शहर, घर हो या कार्यालय, चाय की दुकान हो या पान की, बस स्टैंड हो या रेलवे प्लेटफार्म, प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया, खबरीलाल हो या वेब की दुनिया, इस समय चारों तरफ एक ही शब्द का जिक्र है राजनीति। यहाँ सुनने, देखने, और महसूस करने के साथ-साथ उठते-बैठते, जागते-सोते, यहाँ तक कि खाने और पीने में भी सिर्फ राजनीति है। </span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">जातिए क्षेत्र, भाषा इत्यादि, जब तक सामाजिक व्यवस्था का अंग था तब तक सब ठीक था। परन्तु अब यह राजनीतिक व्यवस्था का अंग होता जा रहा है तो भाई, यह उठक-बैठक क्यों? राजनीति न ही कोई आकाश से उतरी हुई कोई व्यवस्था है और न ही राजनेता आकाश से उतरे कोई राजदूत। यह राजनीति भी अपनी है और राजनेता भी हममे से कोई एक तो फिर यह एक दुसरे पर दोष कैसा लगाना? यह भी तो एक राजनीति ही हुई न! अब तो आलम यह हो गया है कि जहां भी राजनीति का जिक्र होता है वहां अपने आप भ्रष्टाचार भी मुंह खोल लेता है और यह स्पष्ट कर देता है की राजनीति और भ्रष्टाचार का तो चोली दामन का साथ हैं, जिसे अलग नहीं किया जा सकता है ।</span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 12pt;">भारत में राजनीति और भ्रष्टाचार का इतिहास</span></strong><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">भारत में राजनीति और भ्रष्टाचार का इतिहास बहुत पुराना है। भारत की आजादी के पूर्व अंग्रंजों ने सुविधाएं प्राप्त करने के लिए भारत के सम्पन्न लोगों को सुविधास्वरूप धन देना प्रारंभ किया। राजे-रजवाड़े और साहूकारों को धन देकर उनसे वे सब प्राप्त कर लेते थे जो उन्हे चाहिए था। अंग्रेज भारत के रईसों को धन देकर अपने ही देश के साथ गद्दारी करने के लिए कहा करते थे और ये रईस ऐसा ही करते थे। यह भ्रष्टाचार वहीं से प्रारम्भ हुआ और तब से आज तक लगातार चलते हुए फल फूल रहा है। </span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">बाबरनामा में उल्लेख है कि कैसे मुट्ठी भर बाहरी हमलावर भारत की सड़कों से गुजरते थे। सड़क के दोनों ओर लाखों की संख्या में खड़े लोग मूकदर्शक बन कर तमाशा देखते थे। बाहरी आक्रमणकारियों ने कहा है कि यह मूकदर्शक बनी भीड़, अगर हमलावरों पर टूट पड़ती, तो भारत के हालात आज शायद अलग होते। इसी तरह पलासी की लड़ाई में एक तरफ़ लाखों की सेना, दूसरी तरफ़ अंग्रेजों के साथ मुट्ठी भर सिपाही, पर भारतीय हार गये। एक तरफ़ 50,000 भारतीयों की फ़ौज, दूसरी ओर अंगरेजों के 3000 सिपाही, पर अंगरेज जीते। भारत फ़िर गुलाम हआ। जब बख्तियार खिलजी ने नालंदा पर ग्यारहवीं शताब्दी में आक्रमण किया, तो क्या हालात थे? खिलजी की सौ से भी कम सिपाहियों की फ़ौज ने नालंदा के दस हजार से अधिक भिक्षुओं को भागने पर मजबूर कर दिया। नालंदा का विश्वप्रसिद्ध पुस्तकालय वषों तक सुलगता रहा।</span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span><br /><strong><span style="font-size: 12pt;">ब्रिटिश राज और भ्रष्टाचार</span></strong><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">अंग्रेजों ने भारत के राजा महराजाओं को भ्रष्ट करके भारत को गुलाम बनाया। उसके बाद उन्होने योजनाबद्ध तरीके से भारत में भ्रष्टाचार को बढावा दिया और भ्रष्टाचार को गुलाम बनाये रखने के प्रभावी हथियार की तरह इस्तेमाल किया। देश में भ्रष्टाचार भले ही वर्तमान में सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ हैं, लेकिन भ्रष्टाचार ब्रिटिश शासनकाल में ही होने लगा था जो हमारे राजनेताओं को विरासत में दे गए थे।</span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">भारत छोड़कर जाते-जाते भी अंग्रेजों की कुटिल बुद्धि ने भारत को और भी गारत करने का सोच लिया था। इसीलिए एक लम्बे अरसे से षड़यन्त्र पूर्वक इस देश में में नफरत फैलाना शुरू कर दिया था। धर्मेन्द्र गौड़ की पुस्तक &#8220;मैं अंग्रेजों का जासूस था&#8221; उनके द्वारा भारत छोड़ने के नफरत फैलाने का साक्ष्य है। भारत को विभाजन की आग में झोंकने की कुटिल योजना पहले से ही उन्होंने बना रखी थी।</span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">इतनी अधिक अराजकता इस देश में अंग्रेजों के आने से पहले कभी नहीं थी। आमतौर पर भ्रष्टाचार तथा गरीबी भारत में कहीं भी कभी भी देखने को नहीं मिलती थी। यदि यह कहा जाए कि गरीबी, सामान्य राजनीति और प्रशासनिक भ्रष्टाचार अंग्रेजों की देन हैं, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। </span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">मुंबई के प्रसिद्ध प्रकाशक और व्यवसायी शानबाग लेखकों और साहित्यकारों में काफी प्रसिद्ध रहे हैं। फोर्ट में उनकी पुस्तकों की दुकान स्ट्रेंड बुक स्टाल एक ग्रंथ तीर्थ ही माना जाता है। अपने देहांत से पहले शानबाग ने भारतीय संपदा और पाठकों पर बड़ा उपकार किया, जब उन्होंने विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार एवं चिंतक विल डूरा की दुर्लभ एवं लुप्तप्राय पुस्तक &#8220;द केस फॉर इंडिया&#8221; का पुनरू प्रकाशन किया। यह पुस्तक अंग्रेजों द्वारा भारत की लूट ही नहीं, बल्कि भारत के प्राचीन संस्कारों, विद्या और चरित्र पर इतिहास के सबसे बड़े आक्रमण का तथ्यात्मक वर्णन करती है। इसमें उन्होंने लिखा है कि भारत केवल एक राष्ट्र ही नहीं था, बल्कि सभ्यता, संस्कृति और भाषा में विश्व का मातृ संस्थान था। </span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">भारतभूमि हमारे दर्शन, संस्कृति और सभ्यता की मां कही जा सकती है। विश्व का ऎसा कोई श्रेष्ठता का क्षेत्र नहीं था, जिसमें भारत ने सर्वोच्च स्थान न हासिल किया हो। चाहे वह वस्त्र निर्माण हो, आभूषण और जवाहरात का क्षेत्र हो, कविता और साहित्य का क्षेत्र हो, बर्तनों और महान वास्तुशिल्प का क्षेत्र हो अथवा समुद्री जहाज का निर्माण क्षेत्र हो, हर क्षेत्र में भारत ने दुनिया को अपना प्रभाव दिखाया।</span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">जब अंग्रेज भारत आए, तो उन्होंने राजनीतिक दृष्टि से कमजोर, लेकिन आर्थिक दृष्टि से अत्यंत वैभव और ऎश्वर्य संपन्न भारत को पाया। ऎसे देश में अंग्रेजों ने धोखाधड़ी, अनैतिकता एवं भ्रष्टाचार के माध्यम से राज्य हड़पे, अमानुषिक टैक्स लगाए, करोड़ों को गरीबी और भुखमरी के गर्त में धकेला तथा भारत की सारी संपदा व वैभव लूटकर ब्रिटेन को मालामाल किया। उन्होंने मद्रास, कोलकाता और मुंबई में हिंदू शासकों से व्यापारिक चौकियां भाड़े पर लीं और बिना अनुमति के वहां अपनी तौपें और सेना, रखीं। 1756 में बंगाल के राजा ने इस प्रकार के आक्रमण का जब विरोध किया और अंग्रेजों के दुर्ग फोर्ट विलियम पर हमला करके उस पर कब्जा कर लिया, तो एक साल बाद रॉबर्ट क्लाइव ने प्लासी के युद्ध में बंगाल को हराकर उस पर कब्जा कर लिया और एक नवाब को दूसरे से लड़ा कर लूट शुरू कर दी। </span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">सिर्फ एक साल में क्लाइव ने 11 लाख 70 हजार डॉलर की रिश्वत ली और 1 लाख 40 हजार डॉलर सालाना नजराना लेना शुरू किया। जांच में उसे गुनहगार पाया गया, लेकिन ब्रिटेन की सेवा के बदले उसे माफी दे दी गई। विल ड्यूरा लिखते हैं कि भारत से 20 लाख का सामान खरीद कर ब्रिटेन में एक करोड़ में बेचा जाता है। अंग्रेजों ने अवध के नवाब को अपनी मां और दादी का खजाना लूट कर अंग्रेजों को 50 लाख डॉलर देने पर मजबूर किया फिर उस पर कब्जा कर लिया और 25 लाख डॉलर में एक दूसरे नवाब को बेच दिया।</span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">अंग्रेजी भाषा चलाने और अंग्रेजों के प्रति दासता मजबूत करने के लिए भारतीय विद्यालय बंद किए गए। 1911 में गोपालकृष्ण गोखले ने संपूर्ण भारतवर्ष में प्रत्येक भारतीय बच्चे के लिए अनिवार्य प्राइमरी शिक्षा का विधेयक लाने की कोशिश की, लेकिन उसे अंग्रेजों ने विफल कर दिया। 1916 में यह विधेयक फिर से लाने की कोशिश की, ताकि संपूर्ण भारतीयों को शिक्षित किया जा सकेए लेकिन इसे भी अंग्रेजों ने विफल कर दिया। </span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">भारतीय सांख्यिकी के महानिदेशक सर विलियम हंटर ने लिखा है कि भारत में 4 करोड़ लोग ऎसे थे, जो कभी भी अपना पेट नहीं भर पाते थे। भूख और गरीबी की ओर धकेल दिए गए समृद्ध भारतीय शारीरिक दृष्टि से कमजोर होकर महामारी के शिकार होने लगे। 1901 में विदेश से आए प्लेग के कारण 2 लाख 72 हजार भारतीय मर गए, 1902 में 50 लाख भारतीय मरे, 1903 में 8 लाख भारतीय मारे गए और 1904 में 10 लाख भारतीय भूख, कुपोषण और प्लेग जैसी महामारी के कारण मारे गए। 1918 में 12 करोड़ 50 लाख भारतीय इनफ्लूएंजा रोग के शिकार हुए, जिनमें से 1 करोड़ 25 लाख लोगों की मौत सरकारी तौर पर दर्ज हुई। </span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">समान काम के लिए अंग्रेजों को भारतीयों से 10 गुना ज्यादा वेतन दिया जाता था और अंग्रेजों से 10 गुना अधिक विद्वान भारतीय को उनकी योग्यता के अनुरूप पद नहीं दिया जाता था। भारत को भ्रष्ट बनाने में अंग्रेजो की प्रमुख भूमिका रही है।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"><strong>भारत को भ्रष्ट बनाने में अंग्रेजो की प्रमुख भूमिका</strong> </span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"><strong>स्वतंत्रता-प्राप्ति और लाइसेंस-परमिट राज्य का उदय :</strong> द्वितीय विश्वयुद्ध की तबाही के कारण ब्रिटेन सहित पूरे विश्व में आवश्यक सामानों की भारी कमी पैदा हो गयी थी जिससे निपटने के लिये राशनिंग की व्यवस्था शुरू हुई। भारत की आजादी के बाद भी भारत की अर्थव्यवस्था राशनिंग, लाइसेंस, परमिट, लालफीताशाही में जकड़ी रही। लाइसेंस-परमिट राज था, तब भी लाइसेंस या परमिट पाने के लिए व्यापारी और उद्योगपति घूस दिया करते थे।</span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"><strong>उदारीकरण और भ्रष्टाचार का खुला खेल:</strong> 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था को उदारीकरण एवं वैश्वीकरण की विश्वव्यापी राजनीति-अर्थशास्त्र से जोड़ा गया। तब तक सोवियत संध का साम्यवादी महासंघ के रूप में बिखराव हो चुका था। पूर्वी यूरोप के अधिकांश देश पूंजीवादी विश्वव्यवस्था के अंग बनने की प्रक्रिया में प्रसव-पीड़ा में गुजर रहे थे। साम्यवादी चीन बाजारोन्मुखी पूंजीवादी औद्योगिकीकरण के रास्ते औद्योगिक विकास का नया मॉडल बन चुका था।</span><br /><span style="font-size: 12pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">पहले भ्रष्टाचार के लिए परमिट-लाइसेंस राज को दोष दिया जाता था, पर जब से देश में वैश्वीकरण, निजीकरण, उदारीकरण, विदेशीकरण, बाजारीकरण एवं विनियमन की नीतियां आई हैं, तब से घोटालों की बाढ़ आ गई है। इन्हीं के साथ बाजारवाद, भोगवाद, विलासिता तथा उपभोक्ता संस्कृति का भी जबर्दस्त हमला शुरू हुआ हैं, और तब से लेकर आज तक राजनीति और भ्रष्टाचार एक ही नजरिये से देखे और समझे जाने लगे।</span></p>
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